Ghazal Poetry (page 471)

चश्म-ओ-गोश पे पहरे हैं

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

चाँद ने अपना दीप जलाया शाम बुझी वीराने में

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

अश्कों से ब-रंग-ए-आब हम ने

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

अपनी ही आवारगी से डर गए

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

अपना शहकार अभी ऐ मिरे बुत-गर न बना

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

अब किसी को देख कर इक सम्त मुड़ जाते हैं हम

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

आती जाती साँस कैसे तेरे ग़म से मन गई

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

ज़रा सी देर जो ख़ौफ़-ए-दवाम ख़त्म हुआ

मुसव्विर सब्ज़वारी

उसी ने हिजरतें कुछ और भी बिताई थीं

मुसव्विर सब्ज़वारी

टूटते जिस्म के महताब बिखर जा मुझ में

मुसव्विर सब्ज़वारी

तह-ब-तह दरिया के सब असरार तक वो ले गया

मुसव्विर सब्ज़वारी

तबाह कर गया सब को मिरे घराने का

मुसव्विर सब्ज़वारी

शहर का रोग है जिस सम्त भी बस जाएगा तू

मुसव्विर सब्ज़वारी

पहचान का असासा वो जब हार आएगा

मुसव्विर सब्ज़वारी

मैं मुन्हरिफ़ था जिस से हर्फ़-ए-इंहिराफ की तरह

मुसव्विर सब्ज़वारी

मैं एक पल की था ख़ुश्बू किधर निकल आया

मुसव्विर सब्ज़वारी

मैं आँधी में रेज़ा रेज़ा इक फूल चुन रहा हूँ

मुसव्विर सब्ज़वारी

लहू-लुहान था शाख़-ए-गुलाब काट के वो

मुसव्विर सब्ज़वारी

लगा है ऐसा कोई कासा-ए-सवाली हों

मुसव्विर सब्ज़वारी

कनार-ए-आब हवा जब भी सनसनाती है

मुसव्विर सब्ज़वारी

कई ज़मानों के दरिया-ए-नील छोड़ गया

मुसव्विर सब्ज़वारी

कड़े हैं कोस सफ़र दूर का ज़रूरी है

मुसव्विर सब्ज़वारी

जो ख़स-ए-बदन था जला बहुत कई निकहतों की तलाश में

मुसव्विर सब्ज़वारी

जो गया यहाँ से इसी मकान में आएगा

मुसव्विर सब्ज़वारी

जिस्म अपना है कोई और न साया अपना

मुसव्विर सब्ज़वारी

जंगल मुदाफ़अत के हलकान हो गए हैं

मुसव्विर सब्ज़वारी

हुसैन ही था जो प्यासा उठा फ़ुरात से वो

मुसव्विर सब्ज़वारी

हवा रह में दिए ताक़ों में मद्धम हो गए हैं

मुसव्विर सब्ज़वारी

हर साँस में मिस्मार खंडर टूटते रहना

मुसव्विर सब्ज़वारी

हमारी तहरीरें वारदातें बहुत ज़माने के बाद होंगी

मुसव्विर सब्ज़वारी