Ghazal Poetry (page 472)
है वहम जैसे कोई नक़्श ये दुहाई दे
मुसव्विर सब्ज़वारी
घिरा हूँ दो क़ातिलों की ज़द में वजूद मेरा न बच सकेगा
मुसव्विर सब्ज़वारी
इक कुतुब-ख़ाना हूँ अपने दरमियाँ खोले हुए
मुसव्विर सब्ज़वारी
देखो कोई ख़्वाब दिन ढले का
मुसव्विर सब्ज़वारी
बिगड़ते बनते दाएरे सवाल सोचते रहे
मुसव्विर सब्ज़वारी
बराबर ख़्वाब से चेहरों की हिजरत देखते रहना
मुसव्विर सब्ज़वारी
बदन के दीवार-ओ-दर में इक शय सी मर गई है
मुसव्विर सब्ज़वारी
आँखें यूँ बरसीं पैराहन भीग गया
मुसव्विर सब्ज़वारी
वो सर्दी से ठिठुरता है न गर्मी ही सताती है
मुसव्विर फ़िरोज़पुरी
मैं निकल के आ गया हूँ तिरी बंदगी से आगे
मुसव्विर फ़िरोज़पुरी
इश्क़ अब जावेदाँ नहीं मिलता
मुसव्विर फ़िरोज़पुरी
दिल के सुकूँ के वास्ते भटके कहाँ कहाँ
मुसव्विर फ़िरोज़पुरी
ढूँड जुगनू कोई ज़ुल्मत को मिटाने वाला
मुसव्विर फ़िरोज़पुरी
अपनी तो मोहब्बत की इतनी सी कहानी है
मुसव्विर फ़िरोज़पुरी
सबा का राज़ भी फूलों के दरमियान खुला
मुसर्रत हाशमी
जब आसमाँ ने नन्हे परिंदों को पर दिए
मुसर्रत हाशमी
ज़रा सी बात पे नाराज़गी अगर है यही
मुर्तज़ा बिरलास
ये मरहले भी मोहब्बत के बाब में आए
मुर्तज़ा बिरलास
वैसे तुम्हें तो आता नज़र सब दुरुस्त है
मुर्तज़ा बिरलास
वअ'दा जो था निबाह का तुम ने वफ़ा नहीं किया
मुर्तज़ा बिरलास
उम्र भर आँखों का दरवाज़ा खुला रहना ही था
मुर्तज़ा बिरलास
तुम इक ऐसे शख़्स को पहचानते हो या नहीं
मुर्तज़ा बिरलास
तुम अगर चाहो कभी बिफरा समुंदर देखना
मुर्तज़ा बिरलास
सारे ज़ालिम अगर सफ़-ब-सफ़ हो गए
मुर्तज़ा बिरलास
साक़ी-गरी का फ़र्ज़ अदा कर दिया गया
मुर्तज़ा बिरलास
सादगी यूँ आज़माई जाएगी
मुर्तज़ा बिरलास
सदा ये किस की है जो दूर से बुलाए मुझे
मुर्तज़ा बिरलास
नींद भी तेरे बिना अब तो सज़ा लगती है
मुर्तज़ा बिरलास
नाम भी अच्छा सा था चेहरा भी था महताब सा
मुर्तज़ा बिरलास
नहर जिस लश्कर की निगरानी में तब थी अब भी है
मुर्तज़ा बिरलास