Ghazal Poetry (page 474)

मिज़ाज-ए-ग़म समझता क्यूँ नहीं है

मुर्ली धर शर्मा तालिब

मिरी डगर से भी इक दिन गुज़र के देख ज़रा

मुर्ली धर शर्मा तालिब

किसे अब दास्ताँ अपनी सुनाएँ

मुर्ली धर शर्मा तालिब

जो सहरा है उसे कैसे समुंदर लिख दिया जाए

मुर्ली धर शर्मा तालिब

जीने की ख़्वाहिशों में कई बार मर गए

मुर्ली धर शर्मा तालिब

हमारी प्यास को इतना जगाया है मुक़द्दर ने

मुर्ली धर शर्मा तालिब

डूब कर इस का भँवर खोलेंगे

मुर्ली धर शर्मा तालिब

तो वहाँ जा के बचेगा दिल-ए-होश्यार ग़लत

मुर्ली धर शाद

तेरी ये ज़ुल्फ़ें नहीं तेरे रुख़-ए-रौशन के पास

मुर्ली धर शाद

तंग आ गए हैं इश्क़ में अब ज़िंदगी से हम

मुर्ली धर शाद

शब-ए-हिज्र में याद आना किसी का

मुर्ली धर शाद

क़ातिल को तेग़-ए-नाज़ पे है नाज़ देखना

मुर्ली धर शाद

पज़मुर्दा दिल है वस्ल के अरमाँ को क्या हुआ

मुर्ली धर शाद

न कोई मेहरबाँ अपना न कोई राज़-दाँ अपना

मुर्ली धर शाद

मुँह तिरा क्यूँ आज ज़ोर-ए-ना-तवानी फिर गया

मुर्ली धर शाद

मौत आएगी जो रुस्वाई का सामाँ होगा

मुर्ली धर शाद

क्यूँ बहार आते ही पहलू में बुझा आप ही आप

मुर्ली धर शाद

कब मिटाए से मिटा रंज-ओ-सुऊबत का असर

मुर्ली धर शाद

हक़्क़-ए-ने'मत अदा नहीं होता

मुर्ली धर शाद

दोस्त बन कर वो दिलसिताँ न रहा

मुर्ली धर शाद

बस यही तो मुद्दआ है आप के इरशाद का

मुर्ली धर शाद

आशियाना मिरा बर्बाद न कर ऐ सय्याद

मुर्ली धर शाद

आशिक़ तो बद-नसीब है इस में कलाम क्या

मुर्ली धर शाद

ये आगही है जो करती है मुझ को ज़ात में गुम

मुक़सित नदीम

नहीं कुछ और तो मुमकिन थी ख़ुद-कुशी फिर भी

मुक़ीम एहसान कलीम

यादगार-ए-ज़माना हैं हम लोग

मुंतज़िर लखनवी

हम न वहशत के मारे मरते हैं

मुंतज़िर लखनवी

दिल कसू से तो क्या लगाना था

मुंतज़िर लखनवी

तेरी निगाह-ए-नाज़ के बिस्मिल न होंगे हम

मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी

क़ुर्बत के उन दिनों में भी जाना पड़ा मुझे

मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी