Ghazal Poetry (page 476)

रूठोगे बे-सबब तो मनाया न जाएगा

मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी

मुद्दआ' गिर्या से कुछ इश्क़ का इज़हार नहीं

मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी

हम ढूँडते हैं बाग़ में इस गुल-एज़ार को

मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी

हर दम शगुफ़्ता-तर जो हँसी में दहन हुआ

मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी

चमके हैं सब के बख़्त तिरी जल्वा-गाह में

मुंशी बिहारी लाल मुश्ताक़ देहलवी

है इश्क़ में अबरू के जो काहीदा तन अपना

मुंशी बनवारी लाल शोला

याद-ए-माज़ी के उजालों में बहुत देर तलक

मुनीरुद्दीन सहर सईदी

ख़ुलूस प्यार वफ़ा दोस्ती सिला क्या है

मुनीरुद्दीन सहर सईदी

कमाल-ए-इश्क़ दिखाने पे अब कमर बाँधो

मुनीरुद्दीन सहर सईदी

दिल से जिस को चाहता हूँ क्यूँ उसे रुस्वा करूँ

मुनीरुद्दीन सहर सईदी

अपने इक़रार पे क़ाएम न वो इंकार पे है

मुनीरुद्दीन सहर सईदी

ज़ख़्मी न भूल जाएँ मज़े दिल की टीस के

मुनीर शिकोहाबादी

वो ज़ुल्फ़ हवा से मुझे बरहम नज़र आई

मुनीर शिकोहाबादी

उम्र बाक़ी राह-ए-जानाँ में बसर होने को है

मुनीर शिकोहाबादी

तुम्हारे घर से पस-ए-मर्ग किस के घर जाता

मुनीर शिकोहाबादी

तिरछी नज़र से देखिए तलवार चल गई

मुनीर शिकोहाबादी

तेरे हाथों से मिटेगा नक़्श-ए-हस्ती एक दिन

मुनीर शिकोहाबादी

तस्वीर-ए-ज़ुल्फ़-ओ-आरिज़-ए-गुलफ़ाम ले गया

मुनीर शिकोहाबादी

शब के हैं माह मेहर हैं दिन के

मुनीर शिकोहाबादी

सख़्त-जानी का सही अफ़्साना है

मुनीर शिकोहाबादी

सब्ज़ा तुम्हारे रुख़ के लिए तंग हो गया

मुनीर शिकोहाबादी

साबित रहा फ़लक मिरे नालों के सामने

मुनीर शिकोहाबादी

रोज़ दिलहा-ए-मै-कशाँ टूटे

मुनीर शिकोहाबादी

राह में सूरत-ए-नक़्श-ए-कफ़-ए-पा रहता हूँ

मुनीर शिकोहाबादी

राह कर के उस बुत-ए-गुमराह ने धोका दिया

मुनीर शिकोहाबादी

क़ैदी हूँ सर-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर से पहले

मुनीर शिकोहाबादी

पेच फ़िक़रे पर किया जाता नहीं

मुनीर शिकोहाबादी

पहुँचा है उस के पास ये आईना टूट के

मुनीर शिकोहाबादी

नाज़ुक ऐसा नहीं किसी का पेट

मुनीर शिकोहाबादी

नशे में सहवन कर ली तौबा

मुनीर शिकोहाबादी