Ghazal Poetry (page 478)
अक्स-ए-रुख़-ए-गुलगूँ से तमाशा नज़र आया
मुनीर शिकोहाबादी
ऐसी हुई सरसब्ज़-शिकायत की कड़ी बात
मुनीर शिकोहाबादी
ऐ बुत जो शब-ए-हिज्र में दिल थाम न लेते
मुनीर शिकोहाबादी
अबरू की तेरी ज़र्ब-ए-दो-दस्ती चली गई
मुनीर शिकोहाबादी
आँखें ख़ुदा ने बख़्शी हैं रोने के वास्ते
मुनीर शिकोहाबादी
आमद तसव्वुर-ए-बुत-ए-बेदाद-गर की है
मुनीर शिकोहाबादी
आख़िर को राह-ए-इश्क़ में हम सर के बल गए
मुनीर शिकोहाबादी
आईने के अक्स से गुल सा बदन मैला हुआ
मुनीर शिकोहाबादी
यूँ तो अक्सर दिल भी धड़के चेहरे पर
मुनीर सैफ़ी
तलब से भी कुछ और ज़ियादा मिला
मुनीर सैफ़ी
निडर भी ज़ात में अपनी हूँ ख़ुद से ख़ाइफ़ भी
मुनीर सैफ़ी
जब से मैं ख़ुद-शनास हो गया हूँ
मुनीर सैफ़ी
हवाओं से उलझे शजर रात-भर
मुनीर सैफ़ी
हवा के साथ सफ़र इख़्तियार करना था
मुनीर सैफ़ी
आवाज़ दे के ख़ुद को बुलाना पड़ा मुझे
मुनीर सैफ़ी
ज़ोर पैदा जिस्म ओ जाँ की ना-तवानी से हुआ
मुनीर नियाज़ी
ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या
मुनीर नियाज़ी
ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ
मुनीर नियाज़ी
ये आँख क्यूँ है ये हाथ क्या है
मुनीर नियाज़ी
वो जो मेरे पास से हो कर किसी के घर गया
मुनीर नियाज़ी
वक़्त से कहियो ज़रा कम कम चले
मुनीर नियाज़ी
उस सम्त मुझ को यार ने जाने नहीं दिया
मुनीर नियाज़ी
उस का नक़्शा एक बे-तरतीब अफ़्साने का था
मुनीर नियाज़ी
उन से नयन मिला के देखो
मुनीर नियाज़ी
उगा सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर आहिस्ता आहिस्ता
मुनीर नियाज़ी
तुझ से बिछड़ कर क्या हूँ मैं अब बाहर आ कर देख
मुनीर नियाज़ी
थी जिस की जुस्तुजू वो हक़ीक़त नहीं मिली
मुनीर नियाज़ी
थके लोगों को मजबूरी में चलते देख लेता हूँ
मुनीर नियाज़ी
थकन से राह में चलना मुहाल भी है मुझे
मुनीर नियाज़ी
सुन बस्तियों का हाल जो हद से गुज़र गईं
मुनीर नियाज़ी