Ghazal Poetry (page 479)

शाम के मस्कन में वीराँ मय-कदे का दर खुला

मुनीर नियाज़ी

शहर पर्बत बहर-ओ-बर को छोड़ता जाता हूँ मैं

मुनीर नियाज़ी

शब-ए-विसाल में दूरी का ख़्वाब क्यूँ आया

मुनीर नियाज़ी

शब-ए-माहताब ने शह-नशीं पे अजीब गुल सा खिला दिया

मुनीर नियाज़ी

सारे मंज़र एक जैसे सारी बातें एक सी

मुनीर नियाज़ी

सहन को चमका गई बेलों को गीला कर गई

मुनीर नियाज़ी

सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो

मुनीर नियाज़ी

साए घटते जाते हैं

मुनीर नियाज़ी

साअत-ए-हिज्राँ है अब कैसे जहानों में रहूँ

मुनीर नियाज़ी

रिदा उस चमन की उड़ा ले गई

मुनीर नियाज़ी

रौशनी दर रौशनी है उस तरफ़

मुनीर नियाज़ी

रंज-ए-फ़िराक़-ए-यार में रुस्वा नहीं हुआ

मुनीर नियाज़ी

रंगों की वहशतों का तमाशा थी बाम-ए-शाम

मुनीर नियाज़ी

रहता है इक हर उस सा क़दमों के साथ साथ

मुनीर नियाज़ी

रात इतनी जा चुकी है और सोना है अभी

मुनीर नियाज़ी

पी ली तो कुछ पता न चला वो सुरूर था

मुनीर नियाज़ी

फूल थे बादल भी था और वो हसीं सूरत भी थी

मुनीर नियाज़ी

नील-ए-फ़लक के इस्म में नक़्श-ए-असीर के सबब

मुनीर नियाज़ी

नवाह-ए-वुसअत-ए-मैदाँ में हैरानी बहुत है

मुनीर नियाज़ी

नशेब-ए-वहम फ़राज़-ए-गुरेज़-पा के लिए

मुनीर नियाज़ी

नाम बेहद थे मगर उन का निशाँ कोई न था

मुनीर नियाज़ी

मिसाल-ए-संग खड़ा है उसी हसीं की तरह

मुनीर नियाज़ी

मेरी सारी ज़िंदगी को बे-समर उस ने किया

मुनीर नियाज़ी

मकाँ में क़ैद-ए-सदा की दहशत

मुनीर नियाज़ी

महफ़िल-आरा थे मगर फिर कम-नुमा होते गए

मुनीर नियाज़ी

कोई हद नहीं है कमाल की

मुनीर नियाज़ी

कोई दाग़ है मिरे नाम पर

मुनीर नियाज़ी

किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते

मुनीर नियाज़ी

ख़्वाब-ओ-ख़याल-ए-गुल से किधर जाए आदमी

मुनीर नियाज़ी

ख़्वाब-ओ-ख़याल-ए-गुल से किधर जाए आदमी

मुनीर नियाज़ी