Ghazal Poetry (page 477)

मुज़्तरिब आशिक़-ए-बे-जाँ न हुआ था सो हुआ

मुनीर शिकोहाबादी

मेरी शम-ए-अंजुमन में गुल है गुल में ख़ाक है

मुनीर शिकोहाबादी

मैं रोता हूँ आह-ए-रसा बंद है

मुनीर शिकोहाबादी

क्यूँकर शिकार-ए-हुस्न न खेलें यहाँ के लोग

मुनीर शिकोहाबादी

कुछ नहीं हासिल सिपर को चीर को या तलवार तोड़

मुनीर शिकोहाबादी

ख़ूबान-ए-फुसूँ-गर से हम उलझा नहीं करते

मुनीर शिकोहाबादी

ख़ाकसारी से जो ग़ाफ़िल दिल-ए-ग़म्माज़ हुआ

मुनीर शिकोहाबादी

करता है बाग़-ए-दहर में नैरंगियाँ बसंत

मुनीर शिकोहाबादी

काबे से मुझ को लाए सवाद-ए-कुनिश्त में

मुनीर शिकोहाबादी

जुदाई के सदमों को टाले हुए हैं

मुनीर शिकोहाबादी

जो ज़ौक़ है कि हो दरयाफ़्त आबरू-ए-शराब

मुनीर शिकोहाबादी

जलसों में गुज़रने लगी फिर रात तुम्हारी

मुनीर शिकोहाबादी

जब हम-बग़ल वो सर्व क़बा पोश हो गया

मुनीर शिकोहाबादी

होती है हार जीत पिन्हाँ बात बात में

मुनीर शिकोहाबादी

हाथ मलवाती हैं हूरों को तुम्हारी चूड़ियाँ

मुनीर शिकोहाबादी

हमारी रूह जो तेरी गली में आई है

मुनीर शिकोहाबादी

हल्क़ा हल्क़ा घर बना लख़्त-ए-दिल-ए-बेताब का

मुनीर शिकोहाबादी

है ईद लाओ मय-ए-लाला-फ़ाम उठ उठ कर

मुनीर शिकोहाबादी

हाल-ए-पोशीदा खुला सामान-ए-इबरत देख कर

मुनीर शिकोहाबादी

ग़म सहते हैं पर ग़म्ज़ा-ए-बेजा नहीं उठता

मुनीर शिकोहाबादी

फ़ौज-ए-मिज़्गाँ का कुछ इरादा है

मुनीर शिकोहाबादी

फ़स्ल-ए-बहार आई है पैमाना चाहिए

मुनीर शिकोहाबादी

दुश्मन की मलामत बला है

मुनीर शिकोहाबादी

दुनिया से दाग़-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम ले गया

मुनीर शिकोहाबादी

दिल तो पज़मुर्दा है दाग़-ए-गुल्सिताँ हों तो क्या

मुनीर शिकोहाबादी

बुतों के घर की तरफ़ काबे के सफ़र से फिरे

मुनीर शिकोहाबादी

बे-वक़्त जो घर से वो मसीहा निकल आया

मुनीर शिकोहाबादी

बढ़ चला इश्क़ तो दिल छोड़ के दुनिया उट्ठा

मुनीर शिकोहाबादी

और मुझ सा जान देने का तमन्नाई नहीं

मुनीर शिकोहाबादी

असर कर के आह-ए-रसा फिर गई

मुनीर शिकोहाबादी