Ghazal Poetry (page 481)

डर के किसी से छुप जाता है जैसे साँप ख़ज़ाने में

मुनीर नियाज़ी

चाँद निकला है सर-ए-क़र्या-ए-ज़ुल्मत देखो

मुनीर नियाज़ी

चमन मैं रंग-ए-बहार उतरा तो मैं ने देखा

मुनीर नियाज़ी

बे-ख़याली में यूँही बस इक इरादा कर लिया

मुनीर नियाज़ी

बे-हक़ीक़त दूरियों की दास्ताँ होती गई

मुनीर नियाज़ी

बेगानगी का अब्र-ए-गिराँ-बार खुल गया

मुनीर नियाज़ी

बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना

मुनीर नियाज़ी

बस एक माह-ए-जुनूँ-ख़ेज़ की ज़िया के सिवा

मुनीर नियाज़ी

बैठ जाता है वो जब महफ़िल में आ के सामने

मुनीर नियाज़ी

और हैं कितनी मंज़िलें बाक़ी

मुनीर नियाज़ी

अश्क-ए-रवाँ की नहर है और हम हैं दोस्तो

मुनीर नियाज़ी

अपनी ही तेग़-ए-अदा से आप घायल हो गया

मुनीर नियाज़ी

अपने घर को वापस जाओ रो रो कर समझाता है

मुनीर नियाज़ी

अपना तो ये काम है भाई दिल का ख़ून बहाते रहना

मुनीर नियाज़ी

अभी मुझे इक दश्त-ए-सदा की वीरानी से गुज़रना है

मुनीर नियाज़ी

आइना अब जुदा नहीं करता

मुनीर नियाज़ी

आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की

मुनीर नियाज़ी

आ गई याद शाम ढलते ही

मुनीर नियाज़ी

डूबता दर्द का सूरज तिरे इज़हार में था

मुनीर फ़ातमी

ये भी इसरार कोई रौज़न-ए-दर बाज़ न हो

मुनीर अहमद देहलवी

रुकती नहीं है गर्दिश-ए-दौराँ कहा न था

मुनीर अहमद देहलवी

सरसराहट दर्द की रिसते हुए ज़ख़्मों की गूँज

मुनीर अहमद जामी

लफ़्ज़ की तह से ये मफ़्हूम तलक जाती है

मुनीर अहमद जामी

ये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गया

मुनव्वर राना

ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं

मुनव्वर राना

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा

मुनव्वर राना

ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है

मुनव्वर राना

वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है

मुनव्वर राना

थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए

मुनव्वर राना

सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है

मुनव्वर राना