Ghazal Poetry (page 482)

सहरा-पसंद हो के सिमटने लगा हूँ मैं

मुनव्वर राना

सहरा पे बुरा वक़्त मिरे यार पड़ा है

मुनव्वर राना

फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे

मुनव्वर राना

पैरों को मिरे दीदा-ए-तर बाँधे हुए है

मुनव्वर राना

मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी

मुनव्वर राना

मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है

मुनव्वर राना

मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता

मुनव्वर राना

मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं

मुनव्वर राना

मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ

मुनव्वर राना

महफ़िल में आज मर्सिया-ख़्वानी ही क्यूँ न हो

मुनव्वर राना

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई

मुनव्वर राना

किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ

मुनव्वर राना

ख़ुद अपने ही हाथों का लिखा काट रहा हूँ

मुनव्वर राना

ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना

मुनव्वर राना

काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले

मुनव्वर राना

जुदा रहता हूँ मैं तुझ से तो दिल बे-ताब रहता है

मुनव्वर राना

हम कुछ ऐसे तिरे दीदार में खो जाते हैं

मुनव्वर राना

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है

मुनव्वर राना

घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं

मुनव्वर राना

दुनिया तिरी रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ

मुनव्वर राना

दोहरा रहा हूँ बात पुरानी कही हुई

मुनव्वर राना

दरिया-दिली से अब्र-ए-करम भी नहीं मिला

मुनव्वर राना

छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है

मुनव्वर राना

चले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम ने

मुनव्वर राना

भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है

मुनव्वर राना

बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना

मुनव्वर राना

अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई

मुनव्वर राना

अलमारी से ख़त उस के पुराने निकल आए

मुनव्वर राना

ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे

मुनव्वर राना

अच्छी से अच्छी आब-ओ-हवा के बग़ैर भी

मुनव्वर राना