Ghazal Poetry (page 480)
ख़ुमार-ए-शब में उसे मैं सलाम कर बैठा
मुनीर नियाज़ी
ख़याल-ए-यकता में ख़्वाब इतने
मुनीर नियाज़ी
ख़याल जिस का था मुझे ख़याल में मिला मुझे
मुनीर नियाज़ी
जो मुझे भुला देंगे मैं उन्हें भुला दूँगा
मुनीर नियाज़ी
जो देखे थे जादू तिरे हात के
मुनीर नियाज़ी
जफ़ाएँ दूर तक जाती हैं कम आबाद शहरों में
मुनीर नियाज़ी
जब भी घर की छत पर जाएँ नाज़ दिखाने आ जाते हैं
मुनीर नियाज़ी
इतने ख़ामोश भी रहा न करो
मुनीर नियाज़ी
इस शहर-ए-संग-दिल को जला देना चाहिए
मुनीर नियाज़ी
इस शहर के यहीं कहीं होने का रंग है
मुनीर नियाज़ी
इम्तिहाँ हम ने दिए इस दार-ए-फ़ानी में बहुत
मुनीर नियाज़ी
हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया
मुनीर नियाज़ी
हैं रवाँ उस राह पर जिस की कोई मंज़िल न हो
मुनीर नियाज़ी
है उस गुल-रंग का दीवार होना
मुनीर नियाज़ी
है शक्ल तेरी गुलाब जैसी
मुनीर नियाज़ी
ग़म की बारिश ने भी तेरे नक़्श को धोया नहीं
मुनीर नियाज़ी
ग़ैरों से मिल के ही सही बे-बाक तो हुआ
मुनीर नियाज़ी
इक तेज़ तीर था कि लगा और निकल गया
मुनीर नियाज़ी
एक नगर के नक़्श भुला दूँ एक नगर ईजाद करूँ
मुनीर नियाज़ी
इक मसाफ़त पाँव शल करती हुई सी ख़्वाब में
मुनीर नियाज़ी
एक मैं और इतने लाखों सिलसिलों के सामने
मुनीर नियाज़ी
इक आलम-ए-हिज्राँ ही अब हम को पसंद आया
मुनीर नियाज़ी
दिन अगर चढ़ता उधर से मैं इधर से जागता
मुनीर नियाज़ी
दिल को हाल-ए-क़रार में देखा
मुनीर नियाज़ी
दिल ख़ौफ़ में है आलम-ए-फ़ानी को देख कर
मुनीर नियाज़ी
दिल का सफ़र बस एक ही मंज़िल पे बस नहीं
मुनीर नियाज़ी
दिल जल रहा था ग़म से मगर नग़्मा-गर रहा
मुनीर नियाज़ी
दिल अजब मुश्किल में है अब अस्ल रस्ते की तरफ़
मुनीर नियाज़ी
देती नहीं अमाँ जो ज़मीं आसमाँ तो है
मुनीर नियाज़ी
दश्त-ए-बाराँ की हवा से फिर हरा सा हो गया
मुनीर नियाज़ी