Ghazal Poetry (page 473)

मिलते ही ख़ुद को आप से वाबस्ता कह दिया

मुर्तज़ा बिरलास

मौज-दर-मौज नज़र आता था सैलाब मुझे

मुर्तज़ा बिरलास

किस किस का मुँह बंद करोगे किस किस को समझाओगे

मुर्तज़ा बिरलास

काश बादल की तरह प्यार का साया होता

मुर्तज़ा बिरलास

जुनूँ का ज़िक्र मिरा आम हो गया तो क्या

मुर्तज़ा बिरलास

जीते-जी मेरे हर इक मुझ पे ही तन्क़ीद करे

मुर्तज़ा बिरलास

जिस को देखो ज़र्द चेहरा आँख पथराई हुई

मुर्तज़ा बिरलास

जब ज़रा हुई आहट शाख़ पर हिले पत्ते

मुर्तज़ा बिरलास

हम कि तजदीद-ए-अहद-ए-वफ़ा कर चले आबरू-ए-जुनूँ कुछ सिवा कर चले

मुर्तज़ा बिरलास

हम ही नहीं जो तेरी तलब में डेरे डेरे फिरते हैं

मुर्तज़ा बिरलास

हम-ज़मीरों से जो भटकाए वो एज़ाज़ न दे

मुर्तज़ा बिरलास

हमारे क़ौल ओ अमल में तज़ाद कितना है

मुर्तज़ा बिरलास

ग़ैर के आगे ये सर ख़म देखिए कब तक रहे

मुर्तज़ा बिरलास

इक याद थी किसी की जो बादल बनी रही

मुर्तज़ा बिरलास

इक ख़्वाब लड़कपन में जो देखा था वो तुम थे

मुर्तज़ा बिरलास

इक बर्ग-ए-सब्ज़ शाख़ से कर के जुदा भी देख

मुर्तज़ा बिरलास

इक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते

मुर्तज़ा बिरलास

दुनिया को देखिए ज़रा आँखें तो खोलिए

मुर्तज़ा बिरलास

चेहरे पे मेरे रंग परेशानियों का है

मुर्तज़ा बिरलास

बे-हिस ओ कज-फ़हम ओ ला-परवा कहे

मुर्तज़ा बिरलास

बदन में जाग उठी कपकपाहटें कैसी

मुर्तज़ा बिरलास

बात बे-शक न करें आप इधर देखें तो

मुर्तज़ा बिरलास

आँखें हैं सुर्ख़ होंट सियह रंग ज़र्द है

मुर्तज़ा बिरलास

आँखें हैं सुर्ख़ होंट सियह रंग ज़र्द है

मुर्तज़ा बिरलास

आँख बरसी है तिरे नाम पे सावन की तरह

मुर्तज़ा बिरलास

यक़ीं की हद में हूँ या वर्ता-ए-गुमान में हूँ

मुर्तज़ा अली शाद

गुलाब-चेहरे पे शब का ए'जाज़ बोलता है

मुर्तज़ा अली शाद

छटा ग़ुबार तो आँखों में भर गया पानी

मुर्तज़ा अली शाद

ये क्या कि पहले क़रीब होना बना के चलना है फ़ासला फिर

मुर्ली धर शर्मा तालिब

वक़्त अच्छा जो मिरा था पहले

मुर्ली धर शर्मा तालिब