Ghazal Poetry (page 470)
आता है किस अंदाज़ से टुक नाज़ तो देखो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आशिक़ तो मिलेंगे तुझे इंसाँ न मिलेगा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आशिक़ कहें हैं जिन को वो बे-नंग लोग हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आसाँ नहीं है तन्हा दर उस का बाज़ करना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आँखें हैं जोश-ए-अश्क से पनघट
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आना है यूँ मुहाल तो इक शब ब-ख़्वाब आ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आज पलकों को जाते हैं आँसू
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आज ख़ूँ हो के टपक पड़ने के नज़दीक है दिल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आह हमराज़ कौन है अपना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आह देखी थी मैं जिस घर में परी की सूरत
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
आए हो तो ये हिजाब क्या है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ज़िक्र तेरा करेंगे फिर तुझ से
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
ये कैसा खेल है अब उस से बात भी कर लूँ
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
याद फिर आई तिरी मौसम सलोना हो गया
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
सदा ज़-फ़ैज़-ए-असर ख़ामुशी न बन जाए
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
रात ख़्वाबों ने परेशाँ कर दिया
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
निश्तरों पर जिस्म सारा रख दिया
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
कोई बीमार पड़ जाए तो अच्छा कैसे करते हो
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
किस ने दिया है किस का सात
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
किस दश्त-ए-तलब में खो गए हम
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
ख़्वाब हूँ मैं तो मिरी ज़ात से पहले क्या था
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
कभी हँस रहा था कभी गा रहा था
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
जो बीती है जो बीतेगी सब अफ़्साने लगे हम को
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
जाने किस लिए रूठी ऐसे ज़िंदगी हम से
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
हम थे किसी का ध्यान था वो भी नहीं रहा
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
हम तिरा साया थे साया हो के
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
हिकायत-ए-दिल-ए-महज़ूँ न क़िस्सा-ए-मजनूँ
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
इक ख़्वाब थी ज़िंदगी हमारी
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
एक ग़म है उसे अपना जानें
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी