Ghazal Poetry (page 467)

इस क़दर भी तो मिरी जान न तरसाया कर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इस नाज़नीं की बातें क्या प्यारी प्यारियाँ हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इस मर्ग को कब नहीं मैं समझा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इस इश्क़ ओ जुनूँ में न गरेबान का डर है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इस गुलशन-ए-पुर-ख़ार से मानिंद-ए-सबा भाग

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इस गोशा-ए-उज़्लत में तन्हाई है और मैं हूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इन आँखों से आब कुछ न निकला

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

इधर से झाँकते हैं गह उधर से देख लेते हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हूँ शैख़ मुसहफ़ी का मैं हैरान-ए-शाएरी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हम तो उस कूचे में घबरा के चले आते हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हम दिल को लिए बर-सर-ए-बाज़ार खड़े हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हम भी हैं तिरे हुस्न के हैरान इधर देख

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हो चुका नाज़ मुँह दिखाइए बस

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर-चंद कि वो जवाँ नहीं हम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर-चंद कि हो मरीज़-ए-मोहतात

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर-चंद कि बात अपनी कब लुत्फ़ से ख़ाली है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर-चंद बहार ओ बाग़ है ये

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर रोज़ हमें घर से सहरा को निकल जाना

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर दम आते हैं भरे दीदा-ए-गिर्यां तुझ बिन

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हर चंद अमर्दों में है इक राह का मज़ा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हमें नित असीर-ए-बला चाहता है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

है तमन्ना-ए-सैर-ए-बाग़ किसे

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

है माह कि आफ़्ताब क्या है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार है और

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

गिर्या दिल को न सू-ए-चश्म बहाओ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ग़ुस्से को जाने दीजे न तेवरी चढ़ाइए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ग़ज़ल कहने का किस को ढब रहा है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

घर में बाशिंदे तो इक नाज़ में मर जाते हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ग़म तिरा दिल में मिरे फिर आग सुलगाने लगा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ग़ैर के घर तू न रह रात को मेहमान कहीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी