Bewafa Poetry (page 12)
पए-नज़्र-ए-करम तोहफ़ा है शर्म-ए-ना-रसाई का
ग़ालिब
पा-ब-दामन हो रहा हूँ बस-कि मैं सहरा-नवर्द
ग़ालिब
ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
ग़ालिब
नवेद-ए-अम्न है बेदाद-ए-दोस्त जाँ के लिए
ग़ालिब
नाला जुज़ हुस्न-ए-तलब ऐ सितम-ईजाद नहीं
ग़ालिब
न गुल-ए-नग़्मा हूँ न पर्दा-ए-साज़
ग़ालिब
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
ग़ालिब
मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिए
ग़ालिब
लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले
ग़ालिब
लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का
ग़ालिब
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
ग़ालिब
क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है
ग़ालिब
करे है बादा तिरे लब से कस्ब-ए-रंग-ए-फ़रोग़
ग़ालिब
कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए
ग़ालिब
कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
ग़ालिब
जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे
ग़ालिब
हम पर जफ़ा से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ नहीं
ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
ग़ालिब
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
ग़ालिब
है सब्ज़ा-ज़ार हर दर-ओ-दीवार-ए-ग़म-कदा
ग़ालिब
गिला है शौक़ को दिल में भी तंगी-ए-जा का
ग़ालिब
ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँ
ग़ालिब
घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर
ग़ालिब
दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए
ग़ालिब
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
ग़ालिब
दहर में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ
ग़ालिब
बे-ए'तिदालियों से सुबुक सब में हम हुए
ग़ालिब
बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है
ग़ालिब
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
ग़ालिब
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त
ग़ालिब