Hope Poetry (page 34)
ज़बाँ के साथ यहाँ ज़ाइक़ा भी रक्खा है
हमदम कशमीरी
यक़ीन कैसे करूँगा गुमाँ में रहता हूँ
हमदम कशमीरी
वहम कोई गुमाँ में था ही नहीं
हमदम कशमीरी
मिलता है हर चराग़ को साया ज़मीन पर
हमदम कशमीरी
हुआ है सामने आँखों के ख़ानदाँ आबाद
हमदम कशमीरी
एक क़तरा न कहीं ख़ूँ का बहा मेरे बअ'द
हमदम कशमीरी
छटी है राह से गर्द-ए-मलाल मेरे लिए
हमदम कशमीरी
मौसम-ए-हिज्र के आने के शिकायत नहीं की
हलीम कुरेशी
कमरा तो ये कहता है कुछ और हवा आए
हलीम कुरेशी
मरता भला है ज़ब्त की ताक़त अगर न हो
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
मरीज़-ए-इश्क़ की जुज़-मर्ग दुनिया में दवा क्यूँ हो
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
कुछ बात ही थी ऐसी कि थामे जिगर गए
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
जो होनी थी वो हम-नशीं हो चुकी
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
दर्द को रहने भी दे दिल में दवा हो जाएगी
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
चर्चा हमारा इश्क़ ने क्यूँ जा-ब-जा किया
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
बुलबुल को फिर चमन में लगा लाई बू-ए-गुल
हकीम सय्यद मोहम्मद ग़ाज़ीपुरी
घर में जो इक चराग़ था तुम ने उसे बुझा दिया
हकीम नासिर
ज़िंदगी को न बना लें वो सज़ा मेरे बाद
हकीम नासिर
मय-कशी गर्दिश-ए-अय्याम से आगे न बढ़ी
हकीम नासिर
कभी वो हाथ न आया हवाओं जैसा है
हकीम नासिर
इस राह-ए-मोहब्बत में तो आज़ार मिले हैं
हकीम नासिर
हाए वो वक़्त-ए-जुदाई के हमारे आँसू
हकीम नासिर
आँखों ने हाल कह दिया होंट न फिर हिला सके
हकीम नासिर
बाद-ए-सरसर है नसीम-ए-गुलिस्ताँ मेरे लिए
हकीम मोहम्मद हुसैन अहक़र
बाग़ में होना ही शायद सेब की पहचान थी
हकीम मंज़ूर
वो जो अब तक लम्स है उस लम्स का पैकर बने
हकीम मंज़ूर
सारे चेहरे ताँबे के हैं लेकिन सब पर क़लई है
हकीम मंज़ूर
सफ़र ही कोई रहेगा न फ़ासला कोई
हकीम मंज़ूर
मेरे सामने मेरे घर का पूरा नक़्शा बिखरा है
हकीम मंज़ूर
कुछ समझ आया न आया मैं ने सोचा है उसे
हकीम मंज़ूर