Hope Poetry (page 58)
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
ग़ालिब
जब ब-तक़रीब-ए-सफ़र यार ने महमिल बाँधा
ग़ालिब
इश्क़ तासीर से नौमीद नहीं
ग़ालिब
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
ग़ालिब
इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई
ग़ालिब
हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है
ग़ालिब
हूँ मैं भी तमाशाई-ए-नैरंग-ए-तमन्ना
ग़ालिब
हम रश्क को अपने भी गवारा नहीं करते
ग़ालिब
हम पर जफ़ा से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ नहीं
ग़ालिब
हुजूम-ए-नाला हैरत आजिज़-ए-अर्ज़-ए-यक-अफ़्ग़ँ है
ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
ग़ालिब
हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या
ग़ालिब
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
ग़ालिब
हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो
ग़ालिब
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
ग़ालिब
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
ग़ालिब
हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं
ग़ालिब
है सब्ज़ा-ज़ार हर दर-ओ-दीवार-ए-ग़म-कदा
ग़ालिब
है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल
ग़ालिब
है आरमीदगी में निकोहिश बजा मुझे
ग़ालिब
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
ग़ालिब
गिला है शौक़ को दिल में भी तंगी-ए-जा का
ग़ालिब
घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता
ग़ालिब
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
ग़ालिब
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स
ग़ालिब
ग़ाफ़िल ब-वहम-ए-नाज़ ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
ग़ालिब
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
ग़ालिब
गर न अंदोह-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त बयाँ हो जाएगा
ग़ालिब
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
ग़ालिब
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो
ग़ालिब