Hope Poetry (page 59)
एक जा हर्फ़-ए-वफ़ा लिखा था सो भी मिट गया
ग़ालिब
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ग़ालिब
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं
ग़ालिब
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
ग़ालिब
दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया
ग़ालिब
दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना
ग़ालिब
धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव
ग़ालिब
देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे
ग़ालिब
दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
ग़ालिब
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
ग़ालिब
दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
ग़ालिब
चाहिए अच्छों को जितना चाहिए
ग़ालिब
चाक की ख़्वाहिश अगर वहशत ब-उर्यानी करे
ग़ालिब
बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी
ग़ालिब
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
ग़ालिब
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
ग़ालिब
बर्शिकाल-ए-गिर्या-ए-आशिक़ है देखा चाहिए
ग़ालिब
अज़-मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना
ग़ालिब
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
ग़ालिब
आमद-ए-सैलाब-ए-तूफ़ान-ए-सदा-ए-आब है
ग़ालिब
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त
ग़ालिब
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ग़ालिब
आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
ग़ालिब
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
ग़ालिब
आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं
ग़ालिब
आ कि मिरी जान को क़रार नहीं है
ग़ालिब
है तलाश-ए-दो-जहाँ लेकिन ख़बर अपनी किसे
जोर्ज पेश शोर
इक नज़र ने किया है काम तमाम
जोर्ज पेश शोर
दिल में अपने आरज़ू सब कुछ है और फिर कुछ नहीं
जोर्ज पेश शोर
अदम से हस्ती में जब हम आए न कोई हमदर्द साथ लाए
जोर्ज पेश शोर