Love Poetry (page 104)
ज़-बस-कि मश्क़-ए-तमाशा जुनूँ-अलामत है
ग़ालिब
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद
ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
ग़ालिब
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
ग़ालिब
यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का
ग़ालिब
याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे
ग़ालिब
वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक
ग़ालिब
वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
ग़ालिब
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ
ग़ालिब
वो आ के ख़्वाब में तस्कीन-ए-इज़्तिराब तो दे
ग़ालिब
वारस्ता उस से हैं कि मोहब्बत ही क्यूँ न हो
ग़ालिब
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए
ग़ालिब
तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
ग़ालिब
तू दोस्त किसू का भी सितमगर न हुआ था
ग़ालिब
तेरे तौसन को सबा बाँधते हैं
ग़ालिब
तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
ग़ालिब
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
ग़ालिब
सुर्मा-ए-मुफ़्त-ए-नज़र हूँ मिरी क़ीमत ये है
ग़ालिब
सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर
ग़ालिब
शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है
ग़ालिब
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला
ग़ालिब
शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है
ग़ालिब
शब कि वो मजलिस-फ़रोज़-ए-ख़ल्वत-ए-नामूस था
ग़ालिब
शब ख़ुमार-ए-शौक़-ए-साक़ी रुस्तख़ेज़-अंदाज़ा था
ग़ालिब
सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
ग़ालिब
सर-गश्तगी में आलम-ए-हस्ती से यास है
ग़ालिब
सरापा रेहन-इश्क़-ओ-ना-गुज़ीर-उल्फ़त-हस्ती
ग़ालिब
सादगी पर उस की मर जाने की हसरत दिल में है
ग़ालिब
सद जल्वा रू-ब-रू है जो मिज़्गाँ उठाइए
ग़ालिब
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ग़ालिब