Love Poetry (page 106)
मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं
ग़ालिब
मत मर्दुमक-ए-दीदा में समझो ये निगाहें
ग़ालिब
मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है
ग़ालिब
मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिए
ग़ालिब
माना-ए-दश्त-नवर्दी कोई तदबीर नहीं
ग़ालिब
महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का
ग़ालिब
लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले
ग़ालिब
लो हम मरीज़-ए-इश्क़ के बीमार-दार हैं
ग़ालिब
लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और
ग़ालिब
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर
ग़ालिब
लाग़र इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा दे मुझे
ग़ालिब
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
ग़ालिब
क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है
ग़ालिब
कोई उम्मीद बर नहीं आती
ग़ालिब
कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए
ग़ालिब
किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
ग़ालिब
की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं
ग़ालिब
ख़तर है रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-गर्दन न हो जावे
ग़ालिब
ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है
ग़ालिब
कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है
ग़ालिब
करे है बादा तिरे लब से कस्ब-ए-रंग-ए-फ़रोग़
ग़ालिब
कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में
ग़ालिब
कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए
ग़ालिब
कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए
ग़ालिब
कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
ग़ालिब
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
ग़ालिब
काबे में जा रहा तो न दो ताना क्या कहें
ग़ालिब
कब वो सुनता है कहानी मेरी
ग़ालिब
जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार
ग़ालिब
जुनूँ तोहमत-कश-ए-तस्कीं न हो गर शादमानी की
ग़ालिब