Love Poetry (page 107)
जुनूँ की दस्त-गीरी किस से हो गर हो न उर्यानी
ग़ालिब
जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शोला पासबानी
ग़ालिब
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
ग़ालिब
जिस जा नसीम शाना-कश-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार है
ग़ालिब
जौर से बाज़ आए पर बाज़ आएँ क्या
ग़ालिब
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
ग़ालिब
इश्क़ तासीर से नौमीद नहीं
ग़ालिब
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
ग़ालिब
हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है
ग़ालिब
हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है
ग़ालिब
हुस्न-ए-बे-परवा ख़रीदार-ए-माता-ए-जल्वा है
ग़ालिब
हुस्न ग़म्ज़े की कशाकश से छुटा मेरे बअ'द
ग़ालिब
हम पर जफ़ा से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ नहीं
ग़ालिब
हुजूम-ए-नाला हैरत आजिज़-ए-अर्ज़-ए-यक-अफ़्ग़ँ है
ग़ालिब
हुजूम-ए-ग़म से याँ तक सर-निगूनी मुझ को हासिल है
ग़ालिब
हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था
ग़ालिब
हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर
ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
ग़ालिब
हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या
ग़ालिब
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
ग़ालिब
हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो
ग़ालिब
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
ग़ालिब
हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से
ग़ालिब
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
ग़ालिब
है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में
ग़ालिब
है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल
ग़ालिब
है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और
ग़ालिब
है आरमीदगी में निकोहिश बजा मुझे
ग़ालिब
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
ग़ालिब
गुलशन को तिरी सोहबत अज़-बस-कि ख़ुश आई है
ग़ालिब