Love Poetry (page 109)

चश्म-ए-ख़ूबाँ ख़ामुशी में भी नवा-पर्दाज़ है

ग़ालिब

चाहिए अच्छों को जितना चाहिए

ग़ालिब

चाक की ख़्वाहिश अगर वहशत ब-उर्यानी करे

ग़ालिब

बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी

ग़ालिब

बे-ए'तिदालियों से सुबुक सब में हम हुए

ग़ालिब

बज़्म-ए-शाहंशाह में अशआर का दफ़्तर खुला

ग़ालिब

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

ग़ालिब

बर्शिकाल-ए-गिर्या-ए-आशिक़ है देखा चाहिए

ग़ालिब

ब-नाला हासिल-ए-दिल-बस्तगी फ़राहम कर

ग़ालिब

बला से हैं जो ये पेश-ए-नज़र दर-ओ-दीवार

ग़ालिब

बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है

ग़ालिब

बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे

ग़ालिब

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा

ग़ालिब

अर्ज़-ए-नाज़-ए-शोख़ी-ए-दंदाँ बराए-ख़ंदा है

ग़ालिब

अजब नशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे

ग़ालिब

आमद-ए-सैलाब-ए-तूफ़ान-ए-सदा-ए-आब है

ग़ालिब

आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त

ग़ालिब

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

ग़ालिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

ग़ालिब

आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं

ग़ालिब

तुम्हारे इश्क़ में क्या क्या न इख़्तियार किया

जोर्ज पेश शोर

शौक़ ने की जो रहबरी दिल की

जोर्ज पेश शोर

पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा

जोर्ज पेश शोर

जब जवानी गई छुड़ा कर हाथ

जोर्ज पेश शोर

इक नज़र ने किया है काम तमाम

जोर्ज पेश शोर

पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा

जोर्ज पेश शोर

तुम आओगे

गीताञ्जलि राय

सवाल

गीताञ्जलि राय

मैं कैसे भूलूँ वो रातें

गीताञ्जलि राय

किराया-दार

गीताञ्जलि राय