Love Poetry (page 108)
गिला है शौक़ को दिल में भी तंगी-ए-जा का
ग़ालिब
ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँ
ग़ालिब
घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर
ग़ालिब
ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की
ग़ालिब
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स
ग़ालिब
ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
ग़ालिब
ग़ाफ़िल ब-वहम-ए-नाज़ ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
ग़ालिब
गर्म-ए-फ़रियाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे
ग़ालिब
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
ग़ालिब
गर न अंदोह-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त बयाँ हो जाएगा
ग़ालिब
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
ग़ालिब
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो
ग़ालिब
फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर
ग़ालिब
एक जा हर्फ़-ए-वफ़ा लिखा था सो भी मिट गया
ग़ालिब
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ग़ालिब
दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
ग़ालिब
दोनों जहाँ दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
ग़ालिब
दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए
ग़ालिब
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं
ग़ालिब
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
ग़ालिब
दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गई
ग़ालिब
दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना
ग़ालिब
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
ग़ालिब
धमकी में मर गया जो न बाब-ए-नबर्द था
ग़ालिब
देखना क़िस्मत कि आप अपने पे रश्क आ जाए है
ग़ालिब
देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे
ग़ालिब
दर-ख़ूर-ए-क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हम सा न हुआ
ग़ालिब
दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
ग़ालिब
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
ग़ालिब
दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
ग़ालिब