Love Poetry (page 105)
रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी-ए-शमा
ग़ालिब
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
ग़ालिब
रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़
ग़ालिब
रहा गर कोई ता-क़यामत सलामत
ग़ालिब
रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है
ग़ालिब
क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
ग़ालिब
क़तरा-ए-मय बस-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ
ग़ालिब
क़फ़स में हूँ गर अच्छा भी न जानें मेरे शेवन को
ग़ालिब
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
ग़ालिब
फिर कुछ इक दिल को बे-क़रारी है
ग़ालिब
फिर इस अंदाज़ से बहार आई
ग़ालिब
फिर हुआ वक़्त कि हो बाल-कुशा मौज-ए-शराब
ग़ालिब
पए-नज़्र-ए-करम तोहफ़ा है शर्म-ए-ना-रसाई का
ग़ालिब
पा-ब-दामन हो रहा हूँ बस-कि मैं सहरा-नवर्द
ग़ालिब
ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
ग़ालिब
नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने
ग़ालिब
निकोहिश है सज़ा फ़रियादी-ए-बे-दाद-ए-दिलबर की
ग़ालिब
नवेद-ए-अम्न है बेदाद-ए-दोस्त जाँ के लिए
ग़ालिब
नक़्श-ए-नाज़-ए-बुत-ए-तन्नाज़ ब-आग़ोश-ए-रक़ीब
ग़ालिब
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
ग़ालिब
नाला जुज़ हुस्न-ए-तलब ऐ सितम-ईजाद नहीं
ग़ालिब
नहीं है ज़ख़्म कोई बख़िये के दर-ख़ुर मिरे तन में
ग़ालिब
नफ़स न अंजुमन-ए-आरज़ू से बाहर खींच
ग़ालिब
न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सब्ज़ा-ए-ख़त से
ग़ालिब
न हुई गर मिरे मरने से तसल्ली न सही
ग़ालिब
न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा
ग़ालिब
न गुल-ए-नग़्मा हूँ न पर्दा-ए-साज़
ग़ालिब
मुज़्दा ऐ ज़ौक़-ए-असीरी कि नज़र आता है
ग़ालिब
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
ग़ालिब
मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है
ग़ालिब