Love Poetry (page 103)

इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं

ग़ालिब

हूँ गिरफ़्तार-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद

ग़ालिब

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

ग़ालिब

हर बुल-हवस ने हुस्न-परस्ती शिआ'र की

ग़ालिब

हाँ ऐ फ़लक-ए-पीर जवाँ था अभी आरिफ़

ग़ालिब

है पर-ए-सरहद-ए-इदराक से अपना मसजूद

ग़ालिब

है ख़याल-ए-हुस्न में हुस्न-ए-अमल का सा ख़याल

ग़ालिब

है अब इस मामूरे में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त 'असद'

ग़ालिब

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है

ग़ालिब

गरचे है तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पर्दा-दार-ए-राज़-ए-इश्क़

ग़ालिब

गर किया नासेह ने हम को क़ैद अच्छा यूँ सही

ग़ालिब

ए'तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना

ग़ालिब

दोनों जहान दे के वो समझे ये ख़ुश रहा

ग़ालिब

दिल को नियाज़-ए-हसरत-ए-दीदार कर चुके

ग़ालिब

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को

ग़ालिब

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह

ग़ालिब

दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब

चाहते हैं ख़ूब-रूयों को 'असद'

ग़ालिब

बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल

ग़ालिब

बोसा कैसा यही ग़नीमत है

ग़ालिब

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह

ग़ालिब

बे-इश्क़ उम्र कट नहीं सकती है और याँ

ग़ालिब

बहरा हूँ मैं तो चाहिए दूना हो इल्तिफ़ात

ग़ालिब

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा

ग़ालिब

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम

ग़ालिब

आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि ता

ग़ालिब

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब'

ग़ालिब

ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है

ग़ालिब

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'

ग़ालिब

ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं

ग़ालिब