Love Poetry (page 102)

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं

ग़ालिब

वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा

ग़ालिब

उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ

ग़ालिब

था ज़िंदगी में मर्ग का खटका लगा हुआ

ग़ालिब

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना

ग़ालिब

ताअत में ता रहे न मय-ओ-अँगबीं की लाग

ग़ालिब

सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू

ग़ालिब

सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए

ग़ालिब

सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं

ग़ालिब

रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए

ग़ालिब

पी जिस क़दर मिले शब-ए-महताब में शराब

ग़ालिब

फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा

ग़ालिब

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं

ग़ालिब

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम

ग़ालिब

नज़र लगे न कहीं उन के दस्त-ओ-बाज़ू को

ग़ालिब

नज़र लगे न कहीं इन के दस्त-ओ-बाज़ू को

ग़ालिब

मोहब्बत थी चमन से लेकिन अब ये बे-दिमाग़ी है

ग़ालिब

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

ग़ालिब

मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं

ग़ालिब

लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर

ग़ालिब

क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर

ग़ालिब

क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया

ग़ालिब

कोई उम्मीद बर नहीं आती

ग़ालिब

ख़ूब था पहले से होते जो हम अपने बद-ख़्वाह

ग़ालिब

ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो

ग़ालिब

जान दी दी हुई उसी की थी

ग़ालिब

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया

ग़ालिब

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

ग़ालिब

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया

ग़ालिब

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही

ग़ालिब