Love Poetry (page 101)

बेवफ़ा के वा'दे पर ए'तिबार करते हैं

ग़नी एजाज़

अंदाज़-ए-फ़िक्र अहल-ए-जहाँ का जुदा रहा

ग़नी एजाज़

आप अपने को मो'तबर कर लें

ग़नी एजाज़

आदमी की हयात मुट्ठी भर

ग़नी एजाज़

कोई समझाओ उन्हें बहर-ए-ख़ुदा ऐ मोमिनो

ग़मगीन देहलवी

किया बदनाम इक आलम ने 'ग़मगीं' पाक-बाज़ी में

ग़मगीन देहलवी

हाथ से मेरे वो पीता नहीं मुद्दत से शराब

ग़मगीन देहलवी

'ग़मगीं' जो एक आन पे तेरे अदा हुआ

ग़मगीन देहलवी

उस की सूरत का तसव्वुर दिल में जब लाते हैं हम

ग़मगीन देहलवी

उस के कूचे में गया मैं सो फिर आया न गया

ग़मगीन देहलवी

उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी

ग़मगीन देहलवी

शम्अ-रू आशिक़ को अपने यूँ जलाना चाहिए

ग़मगीन देहलवी

न पूछ हिज्र में जो हाल अब हमारा है

ग़मगीन देहलवी

मुझ से आज़ुर्दा जो उस गुल-रू को अब पाते हैं लोग

ग़मगीन देहलवी

मिरा उस के पस-ए-दीवार घर होता तो क्या होता

ग़मगीन देहलवी

मैं ने हर-चंद कि उस कूचे में जाना छोड़ा

ग़मगीन देहलवी

जो न वहम-ओ-गुमान में आवे

ग़मगीन देहलवी

अल्फ़ाज़-ए-बे-सदा का इम्कान आइने में

ग़ालिब इरफ़ान

अक्स की कहानी का इक़्तिबास हम ही थे

ग़ालिब इरफ़ान

तमाम उम्र उसे चाहना न था मुमकिन

ग़ालिब अयाज़

हम उस के जब्र का क़िस्सा तमाम चाहते हैं

ग़ालिब अयाज़

कभी गुमान कभी ए'तिबार बन के रहा

ग़ालिब अयाज़

जबीन-ए-शौक़ पे गर्द-ए-मलाल चाहती है

ग़ालिब अयाज़

हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो

ग़ालिब अयाज़

हुआ करेगा हर इक लफ़्ज़ मुश्क-बार अपना

ग़ालिब अयाज़

दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला

ग़ालिब अयाज़

सदा ब-सहरा

ग़ालिब अहमद

ज़िंदगी में तो वो महफ़िल से उठा देते थे

ग़ालिब

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'

ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

ग़ालिब