Love Poetry (page 125)

वही मैं हूँ वही ख़ाली मकाँ है

फ़ारूक़ नाज़की

तोहमत-ए-सैर-ए-चमन हम पे लगी क्या न हुआ

फ़ारूक़ नाज़की

रंग ख़ाके में नया भर दूँगा मैं

फ़ारूक़ नाज़की

पूरे क़द से मैं खड़ा हूँ सामने आएगा क्या

फ़ारूक़ नाज़की

में इक गाँव का शाएर हूँ

फ़ारूक़ नाज़की

जब भी तुम को सोचा है

फ़ारूक़ नाज़की

हिसार-ए-जिस्म से आगे निकल गया होता

फ़ारूक़ नाज़की

दर्द की रात गुज़रती है मगर आहिस्ता

फ़ारूक़ नाज़की

नजात

फ़ारूक़ मुज़्तर

ये गर्द-ए-राह ये माहौल ये धुआँ जैसे

फ़ारूक़ मुज़्तर

उजले माथे पे नाम लिख रक्खें

फ़ारूक़ मुज़्तर

सलीब-ए-मौजा-ए-आब-ओ-हवा पे लिक्खा हूँ

फ़ारूक़ मुज़्तर

नक़्श आख़िर आप अपना हादिसा हो जाएगा

फ़ारूक़ मुज़्तर

मैं ताइर-ए-वजूद या बर्ग-ए-ख़याल था

फ़ारूक़ मुज़्तर

हर नए मोड़ धूप का सहरा

फ़ारूक़ मुज़्तर

अपनी आँखों के हिसारों से निकल कर देखना

फ़ारूक़ मुज़्तर

आँखों में मौज मौज कोई सोचने लगा

फ़ारूक़ मुज़्तर

यक़ीं मुझे भी है वो आएँगे ज़रूर मगर

फ़ारूक़ बाँसपारी

मिरी ज़िंदगी का महवर यही सोज़-ओ-साज़-ए-हस्ती

फ़ारूक़ बाँसपारी

मिरे नाख़ुदा न घबरा ये नज़र है अपनी अपनी

फ़ारूक़ बाँसपारी

ग़म-ए-इश्क़ ही ने काटी ग़म-ए-इश्क़ की मुसीबत

फ़ारूक़ बाँसपारी

तुम्हारे क़स्र-आज़ादी के मेमारों ने क्या पाया

फ़ारूक़ बाँसपारी

ख़ुशी से फूलें न अहल-ए-सहरा अभी कहाँ से बहार आई

फ़ारूक़ बाँसपारी

कभी बे-नियाज़-ए-मख़्ज़न कभी दुश्मन-ए-किनारा

फ़ारूक़ बाँसपारी

जो रहा यूँ ही सलामत मिरा जज़्ब-ए-वालहाना

फ़ारूक़ बाँसपारी

दिल-ए-ईज़ा-तलब ले तेरा कहना कर लिया मैं ने

फ़ारूक़ बाँसपारी

ब-रोज़-ए-हश्र मिरे साथ दिल-लगी ही तो है

फ़ारूक़ बाँसपारी

वो चाँद-चेहरा सी एक लड़की

फ़ारूक़ बख़्शी

वो बस्ती याद आती है

फ़ारूक़ बख़्शी

शिकायत

फ़ारूक़ बख़्शी