Love Poetry (page 127)
वो अगर अब भी कोई अहद निभाना चाहे
फरीहा नक़वी
उसे भूलने का सितम कर रहे हैं
फरीहा नक़वी
तुम्हें पाने की हैसिय्यत नहीं है
फरीहा नक़वी
इसे भी छोड़ूँ उसे भी छोड़ूँ तुम्हें सभी से ही मसअला है?
फरीहा नक़वी
ऐ मिरी ज़ात के सुकूँ आ जा
फरीहा नक़वी
ज़िंदगी में ऐसी कुछ तुग़्यानीयाँ आती रहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
जलते मौसम में कोई फ़ारिग़ नज़र आता नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
हम एक फ़िक्र के पैकर हैं इक ख़याल के फूल
फ़ारिग़ बुख़ारी
यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
यादों का अजीब सिलसिला है
फ़ारिग़ बुख़ारी
याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रोज़-ओ-शब भी नहीं हैं वो रंग-ओ-बू भी नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रोज़-ओ-शब भी नहीं है वो रंग-ओ-बू भी नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रौशनी है कहाँ जिस के बाद साया नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
तेरी ख़ातिर ये फ़ुसूँ हम ने जगा रक्खा है
फ़ारिग़ बुख़ारी
नश्शे में जो है कोहना शराबों से ज़ियादा
फ़ारिग़ बुख़ारी
मैं शो'ला-ए-इज़हार हूँ कोताह हूँ क़द तक
फ़ारिग़ बुख़ारी
मैं कि अब तेरी ही दीवार का इक साया हूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
क्या अदू क्या दोस्त सब को भा गईं रुस्वाइयाँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
कुछ नहीं गरचे तिरी राहगुज़र से आगे
फ़ारिग़ बुख़ारी
कुछ अब के बहारों का भी अंदाज़ नया है
फ़ारिग़ बुख़ारी
जंगल उगा था हद्द-ए-नज़र तक सदाओं का
फ़ारिग़ बुख़ारी
जबीं का चाँद बनूँ आँख का सितारा बनूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
इज़हार-ए-अक़ीदत में कहाँ तक निकल आए
फ़ारिग़ बुख़ारी
हुए हैं सर्द दिमाग़ों के दहके दहके अलाव
फ़ारिग़ बुख़ारी
हर एक रास्ते का हम-सफ़र रहा हूँ मैं
फ़ारिग़ बुख़ारी
दो घड़ी बैठे थे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं की छाँव में
फ़ारिग़ बुख़ारी
दिल के घाव जब आँखों में आते हैं
फ़ारिग़ बुख़ारी
देखे कोई जो चाक-ए-गरेबाँ के पार भी
फ़ारिग़ बुख़ारी