Love Poetry (page 128)
देख कर उस हसीन पैकर को
फ़ारिग़ बुख़ारी
चाँदनी ने रात का मौसम जवाँ जैसे किया
फ़ारिग़ बुख़ारी
चाँदनी ने रात का मौसम जवाँ जैसे किया
फ़ारिग़ बुख़ारी
अपने ही साए में था में शायद छुपा हुआ
फ़ारिग़ बुख़ारी
जिस बादल ने सुख बरसाया जिस छाँव में प्रीत मिली
फ़रहत ज़ाहिद
लाख रहे शहरों में फिर भी अंदर से देहाती थे
फ़रहत ज़ाहिद
औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ
फ़रहत ज़ाहिद
ज़िंदगी कट गई मनाते हुए
फ़रहत शहज़ाद
सौत क्या शय है ख़ामुशी क्या है
फ़रहत शहज़ाद
परस्तिश की है मेरी धड़कनों ने
फ़रहत शहज़ाद
हम से तंहाई के मारे नहीं देखे जाते
फ़रहत शहज़ाद
ये ज़मीं ख़्वाब है आसमाँ ख़्वाब है
फ़रहत शहज़ाद
शाम कहती है कोई बात जुदा सी लिक्खूँ
फ़रहत शहज़ाद
सौत क्या शय है ख़ामुशी क्या है
फ़रहत शहज़ाद
नहीं है अब कोई रस्ता नहीं है
फ़रहत शहज़ाद
मैं अपने-आप से बरहम था वो ख़फ़ा मुझ से
फ़रहत शहज़ाद
हम से तंहाई के मारे नहीं देखे जाते
फ़रहत शहज़ाद
हयात को तिरी दुश्वार किस तरह करता
फ़रहत शहज़ाद
दश्त-ए-वहशत ने फिर पुकारा है
फ़रहत शहज़ाद
आँख को जकड़े थे कल ख़्वाब अज़ाबों के
फ़रहत शहज़ाद
वो खुल कर मुझ से मिलता भी नहीं है
फ़रहत क़ादरी
था पा-शिकस्ता आँख मगर देखती तो थी
फ़रहत क़ादरी
रातों के अंधेरों में ये लोग अजब निकले
फ़रहत क़ादरी
कोई धड़कन कोई उलझन कोई बंधन माँगे
फ़रहत क़ादरी
जितने लोग नज़र आते हैं सब के सब बेगाने हैं
फ़रहत क़ादरी
जब हर नज़र हो ख़ुद ही तजल्ली-नुमा-ए-ग़म
फ़रहत क़ादरी
आई ख़िज़ाँ चमन में गए दिन बहार के
फ़रहत क़ादरी
ये क्यूँ कहते हो राह-ए-इश्क़ पर चलना है हम को
फ़रहत नदीम हुमायूँ
तिरा दीदार हो आँखें किसी भी सम्त देखें
फ़रहत नदीम हुमायूँ
नहीं होती है राह-ए-इश्क़ में आसान मंज़िल
फ़रहत नदीम हुमायूँ