Love Poetry (page 144)
कुछ ज़िंदगी में लुत्फ़ का सामाँ नहीं रहा
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
कोई तसव्वुर में जल्वा-गर है बहार दिल में समा रही है
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
गुलों के चेहरा-ए-रंगीं पे वो निखार नहीं
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
ग़म-ए-जानाँ के सिवा कुछ हमें प्यारा न हुआ
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे
फ़ैज़ी
कोई नाम है न कोई निशाँ मुझे क्या हुआ
फ़ैज़ी
जो दिल को पहले मयस्सर था क्या हुआ उस का
फ़ैज़ी
जानता हूँ कि कई लोग हैं बेहतर मुझ से
फ़ैज़ी
इस लिए दिल बुरा किया ही नहीं
फ़ैज़ी
अच्छा है तू ने इन दिनों देखा नहीं मुझे
फ़ैज़ी
वो क्या ख़ुशी थी जो दिल में बहाल रहती थी
फ़ैज़ान हाशमी
तेरा बोसा ऐसा प्याला है जिस में से
फ़ैज़ान हाशमी
बस यही सोच के रहता हूँ मैं ज़िंदा इस में
फ़ैज़ान हाशमी
सामने होते थे पहले जिस क़दर होते थे हम
फ़ैज़ान हाशमी
मिला रहा हूँ तिरा हुस्न काएनात के साथ
फ़ैज़ान हाशमी
इसी जहाज़ के सहरा में डूब जाने की
फ़ैज़ान हाशमी
दोनों जहाँ से आ गया कर के इधर उधर की सैर
फ़ैज़ान हाशमी
बस यही सोच के रहता हूँ मैं ज़िंदा इस में
फ़ैज़ान हाशमी
अपने ख़ला में ला कि ये तुम को दिखा रहा हूँ मैं
फ़ैज़ान हाशमी
आँखें बुझ जाएँगी शोला रह जाएगा
फ़ैज़ान हाशमी
वो जितने दूर हैं उतने ही मेरे पास भी हैं
फ़ैज़ुल हसन
सुब्ह-ए-नौ लाती है हर शाम तुम्हें क्या मा'लूम
फ़ैज़ुल हसन
लोग कहते हैं कि क़ातिल को मसीहा कहिए
फ़ैज़ुल हसन
काँच के शहर में पत्थर न उठाओ यारो
फ़ैज़ुल हसन
जब तक मिज़ाज-ए-दोस्त में कुछ बरहमी रही
फ़ैज़ुल हसन
एक मुद्दत से सर-ए-बाम वो आया भी नहीं
फ़ैज़ुल हसन
दिल जिस का दर्द-ए-इश्क़ का हामिल नहीं रहा
फ़ैज़ुल हसन
ऐ दिल अच्छा नहीं मसरूफ़-ए-फ़ुग़ाँ हो जाना
फ़ैज़ुल हसन
तमाम हुस्न-ओ-मआ'नी का रंग उड़ने लगा
फ़ैज़ ख़लीलाबादी
सुराही मुज़्महिल है मय का पियाला थक चुका है
फ़ैज़ ख़लीलाबादी