Love Poetry (page 143)
हाँ वही इश्क़-ओ-मोहब्बत की जिला होती है
फ़ना बुलंदशहरी
है वज्ह कोई ख़ास मिरी आँख जो नम है
फ़ना बुलंदशहरी
ग़म-ए-दुनिया ग़म-ए-हस्ती ग़म-ए-उल्फ़त ग़म-ए-दिल
फ़ना बुलंदशहरी
दुनिया के हर ख़याल से बेगाना कर दिया
फ़ना बुलंदशहरी
दिल बुतों पे निसार करते हैं
फ़ना बुलंदशहरी
बा-होश वही हैं दीवाने उल्फ़त में जो ऐसा करते हैं
फ़ना बुलंदशहरी
अँधेरे लाख छा जाएँ उजाला कम नहीं होता
फ़ना बुलंदशहरी
ऐ सनम तुझ को हम भुला न सके
फ़ना बुलंदशहरी
ऐ सनम देर न कर अंजुमन-आरा हो जा
फ़ना बुलंदशहरी
अब तसव्वुर में हरम है न सनम-ख़ाना है
फ़ना बुलंदशहरी
आँखों में नमी आई चेहरे पे मलाल आया
फ़ना बुलंदशहरी
असली रूप
फख्र ज़मान
आईना
फख्र ज़मान
मुश्किल से चमन में हमें एक बार मिला फूल
फख्र ज़मान
कुछ बात नहीं जिस्म अगर मेरा जला है
फख्र ज़मान
जो धूप की तपती हुई साँसों से बची सोच
फख्र ज़मान
बहादुरी जो नहीं है तो बुज़दिली भी नहीं
फख्र ज़मान
ये जो लाहौर से मोहब्बत है
फख़्र अब्बास
ये जो लाहौर से मोहब्बत है
फख़्र अब्बास
उस ने किया हिजाब मिरे देखने के बा'द
फख़्र अब्बास
घर से तुम्हारी दी हुई चीज़ें निकाल दें
फख़्र अब्बास
दीवाना-पन और बेकारी मिलती है
फख़्र अब्बास
चेहरे से कब अयाँ है मिरे इज़्तिरार भी
फख़्र अब्बास
बिल्कुल तुम सा और तुम्हारा लगता हूँ
फख़्र अब्बास
बिजली सी इक और गिरा दी ज़ालिम ने
फख़्र अब्बास
बोला हैं रंग कितने ज़माने के और भी
फ़ाख़िरा बतूल
तपता सूरज शाम को ढल जाएगा
फ़ैज़ी सम्बलपुरी
जब बुलंदी पर पहुँच जाते हैं लोग
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
तसव्वुर में कोई आया सुकून-ए-क़ल्ब-ओ-जाँ हो कर
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी