Love Poetry (page 142)
चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रुख़-ए-शाम के बाद
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ऐ हुस्न ज़माने के तेवर भी तो समझा कर
फ़ना निज़ामी कानपुरी
आग़ाज़ तो अच्छा था 'फ़ना' दिन भी भले थे
फ़ना बुलंदशहरी
ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता
फ़ना बुलंदशहरी
वो और होंगे जिन को हरम की तलाश है
फ़ना बुलंदशहरी
उन के जल्वों पे हमा-वक़्त नज़र होती है
फ़ना बुलंदशहरी
तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं
फ़ना बुलंदशहरी
तुझे ढूँढती हैं नज़रें मुझे इक झलक दिखा जा
फ़ना बुलंदशहरी
तेरी नज़रों पे तसद्दुक़ आज अहल-ए-होश हैं
फ़ना बुलंदशहरी
तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्त
फ़ना बुलंदशहरी
तिरा ग़म रहे सलामत यही मेरी ज़िंदगी है
फ़ना बुलंदशहरी
निकले वो फूल बन के तिरे गुल्सिताँ से हम
फ़ना बुलंदशहरी
न दहर में न हरम में जबीं झुकी होगी
फ़ना बुलंदशहरी
मुझ को दुनिया के हर इक ग़म से छुड़ा रक्खा है
फ़ना बुलंदशहरी
मिरी लौ लगी है तुझ से ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे
फ़ना बुलंदशहरी
मेरे रश्क-ए-क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया
फ़ना बुलंदशहरी
मिरे दाग़-ए-दिल वो चराग़ हैं नहीं निस्बतें जिन्हें शाम से
फ़ना बुलंदशहरी
मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
फ़ना बुलंदशहरी
माइल-ब-करम मुझ पर हो जाएँ तो अच्छा हो
फ़ना बुलंदशहरी
किस तरह छोड़ दूँ ऐ यार मैं चाहत तेरी
फ़ना बुलंदशहरी
किस को सुनाऊँ हाल-ए-ग़म कोई ग़म-आश्ना नहीं
फ़ना बुलंदशहरी
कहीं सुकूँ न मिला दिल को बज़्म-ए-यार के बा'द
फ़ना बुलंदशहरी
काफ़िर-ए-इश्क़ को क्या से क्या कर दिया
फ़ना बुलंदशहरी
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गया
फ़ना बुलंदशहरी
जल्वा जो तिरे रुख़ का एहसास में ढल जाए
फ़ना बुलंदशहरी
जब तक मिरी निगाह में तेरा जमाल है
फ़ना बुलंदशहरी
जब तक मिरे होंटों पे तिरा नाम रहेगा
फ़ना बुलंदशहरी
हुस्न-ए-बुताँ का इश्क़ मेरी जान हो गया
फ़ना बुलंदशहरी
हरम है क्या चीज़ दैर क्या है किसी पे मेरी नज़र नहीं है
फ़ना बुलंदशहरी
हर घड़ी पेश-ए-नज़र इश्क़ में क्या क्या न रहा
फ़ना बुलंदशहरी