Love Poetry (page 228)
ग़म की बंद मुट्ठी में रेत सा मिरा जीवन
अतीक़ अंज़र
दूर मुझ से रहते हैं सारे ग़म ज़माने के
अतीक़ अंज़र
वो ग़ज़ल की किताब है प्यारे
अतीक़ अंज़र
उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए
अतीक़ अंज़र
न मिल सका तरी लहरों में भी क़रार मुझे
अतीक़ अंज़र
मिरी ज़िंदगी किसी मोड़ पर कभी आँसुओं से वफ़ा न दे
अतीक़ अंज़र
मिरे दिल में ख़ुश्बू बसी थी जो वो मकान अपना बदल गई
अतीक़ अंज़र
किसी ने भेजा है ख़त प्यार और वफ़ा लिख कर
अतीक़ अंज़र
कहानियाँ ख़मोश हैं पहेलियाँ उदास हैं
अतीक़ अंज़र
जिस्म के घरौंदे में आग शोर करती है
अतीक़ अंज़र
जिस की ख़ातिर मैं ने दुनिया की तरफ़ देखा न था
अतीक़ अंज़र
गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था
अतीक़ अंज़र
दिल के आँगन में तिरी याद का तारा चमका
अतीक़ अंज़र
बा'द मुद्दत मिले कुछ कहा न सुना भर गए ज़ख़्म पुरवाइयाँ सो गईं
अतीक़ अंज़र
अश्क इन आँखों से हम दिल में बहा कर देखें
अतीक़ अंज़र
ज़ब्त की हद से हो के गुज़रना सो जाना
अतीक़ इलाहाबादी
हम तो बिछड़ के रो लेते हैं
अतीक़ इलाहाबादी
चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत
अतीक़ इलाहाबादी
अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा
अतीक़ इलाहाबादी
शजर से मिल के जो रोने लगा था
अतीक़ अहमद
मैं अपनी सोचों में एक दरिया बना रहा था
अतीक़ अहमद
मैं अपनी ख़ाक को जब आइना बनाता हूँ
अतीक़ अहमद
खिले हैं फूल उसी रंग की सताइश में
अतीक़ अहमद
वक़्त ने लूटे हैं हस्ती के ख़ज़ाने कितने
अतीब एजाज़
गुमाँ के तन पे यक़ीं का लिबास रहने दो
अतीब एजाज़
दिल पे यादों का बोझ तारी है
अतीब एजाज़
दिल की दहलीज़ पे दिलबर आया
अतीब एजाज़
किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ
अताउर्रहमान क़ाज़ी
शोहरत-ए-फ़न बहुत हुई दाद कमाल दे गए
अताउर्रहमान जमील
माना कि सितारे सर-ए-अफ़्लाक बहुत हैं
अताउर्रहमान जमील