Love Poetry (page 229)
कहाँ गए शब-ए-महताब के जमाल-ज़दा
अताउर्रहमान जमील
आज भी जिस की ख़ुश्बू से है मतवाली मतवाली रात
अताउर्रहमान जमील
वैसे तो इस घर को उस ने चाहे कम ख़ुश-हाली दी
अताउल हसन
तुम्हारे हिज्र का सदक़ा उतार फेंकता है
अताउल हसन
दम-ब-दम एक साथ बैठे हैं
अताउल हसन
गुम हुआ जाता है कोई मंज़िलों की गर्द में
अताउल हक़ क़ासमी
वो सुकून-ए-जिस्म-ओ-जाँ गिर्दाब-ए-जाँ होने को है
अताउल हक़ क़ासमी
वो गर्द है कि वक़्त से ओझल तो मैं भी हूँ
अताउल हक़ क़ासमी
वो एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है
अताउल हक़ क़ासमी
वह एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है
अताउल हक़ क़ासमी
थोड़ी सी उस तरफ़ भी नज़र होनी चाहिए
अताउल हक़ क़ासमी
थोड़ी सी इस तरफ़ भी नज़र होनी चाहिए
अताउल हक़ क़ासमी
मंज़िलें भी ये शिकस्ता-बाल-ओ पर भी देखना
अताउल हक़ क़ासमी
यूँ मोहब्बत से न हम ख़ाना-ब-दोशों को बुला
अता तुराब
तराश और भी अपने तसव्वुर-ए-रब को
अता तुराब
इश्क़ तो अपने लहू में ही सँवरता है सो हम
अता तुराब
रात वहशत से गुरेज़ाँ था मैं आहू की तरह
अता तुराब
नुमू-पज़ीर हूँ हर दम कि मुझ में दम है अभी
अता तुराब
कब कहाँ क्या मिरे दिलदार उठा लाएँगे
अता तुराब
आसमानों में भी दरवाज़ा लगा कर देखें
अता तुराब
दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा
अता शाद
ज़िंदगी आईना है आईना-आराई है
अता शाद
यक लम्हा सही उम्र का अरमान ही रह जाए
अता शाद
पारसाओं ने बड़े ज़र्फ़ का इज़हार किया
अता शाद
गहरी है शब की आँच कि ज़ंजीर-ए-दर कटे
अता शाद
दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा
अता शाद
चोब-ए-सहरा भी वहाँ रश्क-ए-समर कहलाए
अता शाद
चोब-ए-सहरा भी वहाँ रश्क-ए-समर कहलाए
अता शाद
बड़ा कठिन है रास्ता जो आ सको तो साथ दो
अता शाद
ढला जो दिन तो गया नूर-ए-आफ़्ताब भी साथ
अता हुसैन कलीम