Love Poetry (page 233)

न हम-आहंग-ए-मसीहा न हरीफ़-ए-जिब्रील

असरार-उल-हक़ मजाज़

मिरी वफ़ा का तिरा लुत्फ़ भी जवाब नहीं

असरार-उल-हक़ मजाज़

कुछ तुझ को ख़बर है हम क्या क्या ऐ शोरिश-ए-दौराँ भूल गए

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ामुशी का तो नाम होता है

असरार-उल-हक़ मजाज़

करिश्मा-साजी-ए-दिल देखता हूँ

असरार-उल-हक़ मजाज़

कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

जिगर और दिल को बचाना भी है

असरार-उल-हक़ मजाज़

इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम

असरार-उल-हक़ मजाज़

हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए

असरार-उल-हक़ मजाज़

हुस्न को बे-हिजाब होना था

असरार-उल-हक़ मजाज़

दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता-ए-जफ़ा पे कहीं

असरार-उल-हक़ मजाज़

धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी

असरार-उल-हक़ मजाज़

बस इस तक़्सीर पर अपने मुक़द्दर में है मर जाना

असरार-उल-हक़ मजाज़

बर्बाद-ए-तमन्ना पे इताब और ज़ियादा

असरार-उल-हक़ मजाज़

अक़्ल की सतह से कुछ और उभर जाना था

असरार-उल-हक़ मजाज़

ऐश से बे-नियाज़ हैं हम लोग

असरार-उल-हक़ मजाज़

आसमाँ तक जो नाला पहुँचा है

असरार-उल-हक़ मजाज़

आशिक़ी जाँ-फ़ज़ा भी होती है

असरार-उल-हक़ मजाज़

आओ अब मिल के गुलिस्ताँ को गुल्सिताँ कर दें

असरार-उल-हक़ मजाज़

ठहरे तो कहाँ ठहरे आख़िर मिरी बीनाई

असरारुल हक़ असरार

सीना-ए-संग में ढूँढता है गुदाज़

असरारुल हक़ असरार

कुछ तो मायूस दिल तेरे बस में भी है

असरारुल हक़ असरार

जानते थे ग़म तिरा दरिया भी था गहरा भी था

असरारुल हक़ असरार

ऐसी नई कुछ बात न होगी

असरारुल हक़ असरार

वो शख़्स जो नज़र आता था हर किसी की तरह

असरार ज़ैदी

मसरूफ़ हम भी अंजुमन-आराइयों में थे

असरार ज़ैदी

बरहनगी का मुदावा कोई लिबास न था

असरार ज़ैदी

तक़द्दुस-ए-मआब

असरार जामई