Love Poetry (page 235)
इक क़दम उठ गया रवानी में
असलम राशिद
आँख से तारे टूट रहे हैं
असलम राशिद
मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया
असलम महमूद
आ गया कौन ये आज उस के मुक़ाबिल 'असलम'
असलम महमूद
तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा
असलम महमूद
रंग सारे अपने अंदर रफ़्तगाँ के हैं
असलम महमूद
पत्थरों पर वादियों में नक़्श-ए-पा मेरा भी है
असलम महमूद
नए पैकर नए साँचे में ढलना चाहता हूँ मैं
असलम महमूद
न मलाल-ए-हिज्र न मुंतज़िर हैं हवा-ए-शाम-ए-विसाल के
असलम महमूद
मिज़ा पे ख़्वाब नहीं इंतिज़ार सा कुछ है
असलम महमूद
मैं हज्व इक अपने हर क़सीदे की रद में तहरीर कर रहा हूँ
असलम महमूद
मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया
असलम महमूद
क्यूँ मुझ से गुरेज़ाँ है मैं तेरा मुक़द्दर हूँ
असलम महमूद
जल रहा हूँ तो अजब रंग ओ समाँ है मेरा
असलम महमूद
हर रंग-ए-तरब मौसम ओ मंज़र से निकाला
असलम महमूद
देख के अर्ज़ां लहू सुर्ख़ी-ए-मंज़र ख़मोश
असलम महमूद
दश्त मरऊब है कितना मिरी वीरानी से
असलम महमूद
बुझ गए मंज़र उफ़ुक़ पर हर निशाँ मद्धम हुआ
असलम महमूद
अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे
असलम महमूद
ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर
असलम कोलसरी
यार को दीदा-ए-ख़ूँ-बार से ओझल कर के
असलम कोलसरी
वही ख़्वाबीदा ख़ामोशी वही तारीक तन्हाई
असलम कोलसरी
सोच की उलझी हुई झाड़ी की जानिब जो गई
असलम कोलसरी
सिर्फ़ मेरे लिए नहीं रहना
असलम कोलसरी
रूठ कर निकला तो वो उस सम्त आया भी नहीं
असलम कोलसरी
रूठ कर निकला तो वो इस सम्त आया भी नहीं
असलम कोलसरी
नज़र को वक़्फ़-ए-हैरत कर दिया है
असलम कोलसरी
जब मैं उस के गाँव से बाहर निकला था
असलम कोलसरी
हर-चंद बे-नवा है कोरे घड़े का पानी
असलम कोलसरी
हमारी जीत हुई है कि दोनों हारे हैं
असलम कोलसरी