Love Poetry (page 236)

ग़म की सौग़ात है ख़मोशी है

असलम कोलसरी

दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं

असलम कोलसरी

दयार-ए-हिज्र में ख़ुद को तो अक्सर भूल जाता हूँ

असलम कोलसरी

आरज़ू-ए-दवाम करता हूँ

असलम कोलसरी

सामने शाह-ए-वक़्त के 'असलम' कौन कहे ये बात

असलम हनीफ़

ज़ीस्त की धूप से यूँ बच के निकलता क्यूँ है

असलम हबीब

लुटी बहार का सूखा गुलाब रहने दो

असलम हबीब

कोई गुलाब यहाँ पर खिला के देखते हैं

असलम हबीब

किसी की याद का साया था या कि झोंका था

असलम हबीब

आँख को अश्क बना के देख

असलम हबीब

न देख मुझ को मोहब्बत की आँख से ऐ दोस्त

असलम फ़र्रुख़ी

धनक की बूँद

असलम फ़र्रुख़ी

ज़द पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा

असलम फ़र्रुख़ी

ये हिकायत तमाम को पहुँची

असलम फ़र्रुख़ी

मैं सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा न हो जाए

असलम फ़र्रुख़ी

आग सी लग रही है सीने में

असलम फ़र्रुख़ी

नफ़रत से है नफ़रत हम को प्रीत हमारी रीत

असलम फ़ैज़ी

बचपन के हैं ख़्वाब सुहाने तितली फूल और मैं

असलम फ़ैज़ी

हम भी 'असलम' इसी गुमान में हैं

असलम इमादी

नर्म आवाज़ों के बीच

असलम इमादी

वो शब-ए-ग़म जो कम अँधेरी थी

असलम इमादी

कोशिश है गर उस की कि परेशान करेगा

असलम इमादी

कोई इशारा कोई इस्तिआ'रा क्यूँकर हो

असलम इमादी

दिल की धड़कन अब रग-ए-जाँ के बहुत नज़दीक है

असलम इमादी

लिबास-ए-गुल में वो ख़ुशबू के ध्यान से निकला

असलम बदर

दीवारों को दिल से बाहर रखने वाले

असलम बदर

हज़ार बार निगाहों से चूम कर देखा

असलम आज़ाद

धूप के बादल बरस कर जा चुके थे और मैं

असलम आज़ाद

वो क्या है कौन है ये तो ज़रा बता मुझ को

असलम आज़ाद

वक़्त का कुछ रुका सा धारा है

असलम आज़ाद