Love Poetry (page 238)
ख़ुद मैं धूनी रमाए बैठी हूँ
आसिमा ताहिर
अपनी आँखें जो बंद कर देखूँ
आसिमा ताहिर
नहीं वो शम-ए-मोहब्बत रही तो फिर 'आसिम'
आसिम वास्ती
मुझे ख़बर ही नहीं थी कि इश्क़ का आग़ाज़
आसिम वास्ती
मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
आसिम वास्ती
लोग कहते हैं कि वो शख़्स है ख़ुशबू जैसा
आसिम वास्ती
कुछ वो भी तबीअत का सुखी ऐसा नहीं है
आसिम वास्ती
होंटों को फूल आँख को बादा नहीं कहा
आसिम वास्ती
तुम इंतिज़ार के लम्हे शुमार मत करना
आसिम वास्ती
तुम भटक जाओ तो कुछ ज़ौक़-ए-सफ़र आ जाएगा
आसिम वास्ती
सामने रह कर न होना मसअला मेरा भी है
आसिम वास्ती
मिस्र फ़िरऔन की तहवील में आया हुआ है
आसिम वास्ती
मिरी नज़र मिरा अपना मुशाहिदा है कहाँ
आसिम वास्ती
मौजूद जो नहीं वही देखा बना हुआ
आसिम वास्ती
माना किसी ज़ालिम की हिमायत नहीं करते
आसिम वास्ती
मकाँ से दूर कहीं ला-मकाँ से होता है
आसिम वास्ती
कहाँ तलाश में जाऊँ कि जुस्तुजू तू है
आसिम वास्ती
होंटों को फूल आँख को बादा नहीं कहा
आसिम वास्ती
हर तरफ़ हद्द-ए-नज़र तक सिलसिला पानी का है
आसिम वास्ती
है नींद अभी आँख में पल भर में नहीं है
आसिम वास्ती
है मुस्तक़िल यही एहसास कुछ कमी सी है
आसिम वास्ती
एक आँसू में तिरे ग़म का अहाता करते
आसिम वास्ती
दामन-ए-गुल में कहीं ख़ार छुपा देखते हैं
आसिम वास्ती
अगर चुभती हुई बातों से डरना पड़ गया तो
आसिम वास्ती
फबा है रुख़ पे तिरे ख़ुश-नुमा सनम लेकिन
आसिफ़ुद्दौला
मिलते ही नज़र दिल को मिलाया नहीं जाता
आसिफ़ुद्दौला
इस अदा से मुझे सलाम किया
आसिफ़ुद्दौला
हम इश्क़ के बंदे हैं मज़हब से नहीं वाक़िफ़
आसिफ़ुद्दौला
ये अश्क चश्मों में हमदम रहे रहे न रहे
आसिफ़ुद्दौला
तालिब हो वहाँ आन के क्या कोई सनम का
आसिफ़ुद्दौला