Love Poetry (page 312)
किस किस से दोस्ती हुई ये ध्यान में नहीं
आलमताब तिश्ना
हिसार-ए-मक़्तल-ए-जाँ में लहू लहू मैं था
आलमताब तिश्ना
गिनती में बे-शुमार थे कम कर दिए गए
आलमताब तिश्ना
दर्द की इक लहर बल खाती है यूँ दिल के क़रीब
आलमताब तिश्ना
असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना
आलमताब तिश्ना
अहद-ए-कम-कोशी में ये भी हौसला मैं ने किया
आलमताब तिश्ना
अब भी ज़र्रों पे सितारों का गुमाँ है कि नहीं
आलमताब तिश्ना
आइना-ख़ाना भी अंदोह-ए-तमन्ना निकला
आलमताब तिश्ना
मिलेगा ज़ुल्फ़-ए-आज़ादी उन्हें क्या मौसम-ए-गुल में
आलम मुज़फ्फ़र नगरी
उर्दू
आलम मुज़फ्फ़र नगरी
माँगती है अब मोहब्बत अपने होने का सुबूत
आलम ख़ुर्शीद
किसी को ढूँडते हैं हम किसी के पैकर में
आलम ख़ुर्शीद
इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े
आलम ख़ुर्शीद
इस फ़ैसले से ख़ुश हैं अफ़राद घर के सारे
आलम ख़ुर्शीद
ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से
आलम ख़ुर्शीद
थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं
आलम ख़ुर्शीद
तिरे ख़याल को ज़ंजीर करता रहता हूँ
आलम ख़ुर्शीद
तह-ब-तह है राज़ कोई आब की तहवील में
आलम ख़ुर्शीद
सियाह रात के बदन पे दाग़ बन के रह गए
आलम ख़ुर्शीद
नए सिरे से कोई सफ़र आग़ाज़ नहीं करता
आलम ख़ुर्शीद
मैं जिस जगह भी रहूँगा वहीं पे आएगा
आलम ख़ुर्शीद
मैं जिधर जाऊँ मिरा ख़्वाब नज़र आता है
आलम ख़ुर्शीद
क्यूँ आँखें बंद कर के रस्ते में चल रहा हूँ
आलम ख़ुर्शीद
जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी
आलम ख़ुर्शीद
जाना तो बहुत दूर है महताब से आगे
आलम ख़ुर्शीद
हम को लुत्फ़ आता है अब फ़रेब खाने में
आलम ख़ुर्शीद
बस एक तिरे ख़्वाब से इंकार नहीं है
आलम ख़ुर्शीद
इश्क़ इक ऐसी हवेली है कि जिस से बाहर
अकरम नक़्क़ाश
कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ
अकरम नक़्क़ाश
कोई इल्ज़ाम मेरे नाम मेरे सर नहीं आया
अकरम नक़्क़ाश