Love Poetry (page 310)
मैं तो इक लम्हा-ए-परीदा रहा
अली अब्बास उम्मीद
मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ
अलीना इतरत
शाम की पुरवाई
अलीना इतरत
नज़्म तकमील
अलीना इतरत
मुझे तो इंतिज़ार-ए-इश्क़ में ही लुत्फ़ आता है
अलीना इतरत
आज फिर
अलीना इतरत
ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने
अलीना इतरत
ये किस मुहिम पर चले थे हम जिस में रास्ते पुर-ख़तर न आए
अलीना इतरत
सारे मौसम बदल गए शायद
अलीना इतरत
पुकारते पुकारते सदा ही और हो गई
अलीना इतरत
मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ
अलीना इतरत
जुनूँ में दामन-ए-दिल गरचे तार तार हुआ
अलीना इतरत
वो अर्ज़-ए-ग़म पे मश्वरा-ए-इख़्तिसार दे
अलीम उस्मानी
तिरे चाँद जैसे रुख़ पर ये निशान-ए-दर्द क्यूँ हैं
अलीम उस्मानी
मौत आई है ज़माने की तो मर जाने दो
अलीम उस्मानी
मैं उन को कभी हद से गुज़रने नहीं दूँगा
अलीम उस्मानी
गर्दिश-ए-मय का इस पर न होगा असर मस्त आँखों का जादू जिसे याद है
अलीम उस्मानी
देती हैं थपकियाँ तिरी परछाइयाँ मुझे
अलीम उस्मानी
चराग़ शाम से आख़िर जलाएँ किस के लिए
अलीम उस्मानी
बादा-ख़ाने की रिवायत को निभाना चाहिए
अलीम उस्मानी
अब जाम निगाहों के नशा क्यूँ नहीं देते
अलीम उस्मानी
ख़ुश्क आँखों से लहू फूट के रोना इक दिन
अलीम सबा नवेदी
हर मोड़ पे सफ़र था अजब बोलने न पाए
अलीम सबा नवेदी
बा'द मुद्दत के खुला जौहर-ए-नायाब मिरा
अलीम सबा नवेदी
अफ़्साना मोहब्बत का पूरा हो तो कैसे हो
अलीम मसरूर
रूह अफ़्सुर्दा तबीअत मिरी ग़म-कोश हुई
अलीम मसरूर
घबराएँ हवादिस से क्या हम जीने के सहारे निकलेंगे
अलीम मसरूर
इक राज़-ए-ग़म-ए-दिल जब ख़ुद रह न सका दिल तक
अलीम मसरूर
इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला
अलीम मसरूर
चले बज़्म-ए-दौराँ से जब ज़हर पी के
अलीम मसरूर