Love Poetry (page 311)

ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी

अलीम अख़्तर

वो तअल्लुक़ है तिरे ग़म से कि अल्लाह अल्लाह

अलीम अख़्तर

हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब

अलीम अख़्तर

दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए

अलीम अख़्तर

वो क्या गए पयाम-ए-सफ़र दे गए मुझे

अलीम अख़्तर

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए

अलीम अख़्तर

निगाह-ए-लुत्फ़ क्या कम हो गई है

अलीम अख़्तर

मोहब्बत क्या मोहब्बत का सिला क्या

अलीम अख़्तर

मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना

अलीम अख़्तर

किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है

अलीम अख़्तर

दिल को शाइस्ता-ए-एहसास-ए-तमन्ना न करें

अलीम अख़्तर

दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए

अलीम अख़्तर

किराया-दार बदलना तो उस का शेवा था

अलीम अफ़सर

न पूछ रब्त है क्या उस की दास्ताँ से मुझे

अलीम अफ़सर

चले थे भर के रेत जब सफ़र की जिस्म-ओ-जाँ में हम

अलीम अफ़सर

बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग

अलीम अफ़सर

बन कर लहू यक़ीन न आए तो देख लें

अलीम अफ़सर

विसाल-ए-यार की ख़्वाहिश में अक्सर

आलमताब तिश्ना

मा-सिवा-ए-कार-ए-आह-ओ-अश्क क्या है इश्क़ में

आलमताब तिश्ना

इस राह-ए-मोहब्बत में तू साथ अगर होता

आलमताब तिश्ना

हम अपने इश्क़ की अब और क्या शहादत दें

आलमताब तिश्ना

हद हो गई थी हम से मोहब्बत में कुफ़्र की

आलमताब तिश्ना

वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए

आलमताब तिश्ना

उठते हुए तूफ़ान का मंज़र नहीं देखा

आलमताब तिश्ना

सिवाए-दर-ब-दरी उस को ख़ाक मिलता है

आलमताब तिश्ना

शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा हूँ

आलमताब तिश्ना

सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना

आलमताब तिश्ना

सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना

आलमताब तिश्ना

मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे

आलमताब तिश्ना

मैं अपनी जंग में तन-ए-तन्हा शरीक था

आलमताब तिश्ना