Love Poetry (page 320)
देहात के बसने वाले तो इख़्लास के पैकर होते हैं
अख़तर मुस्लिमी
नाले मिरे जब तक मिरे काम आते रहेंगे
अख़तर मुस्लिमी
न समझ सकी जो दुनिया ये ज़बान-ए-बे-ज़बानी
अख़तर मुस्लिमी
माइल-ए-लुत्फ़ है आमादा-ए-बे-दाद भी है
अख़तर मुस्लिमी
किस को कहते हैं जफ़ा क्या है वफ़ा याद नहीं
अख़तर मुस्लिमी
कहाँ जाएँ छोड़ के हम उसे कोई और उस के सिवा भी है
अख़तर मुस्लिमी
दिल ही रह-ए-तलब में न खोना पड़ा मुझे
अख़तर मुस्लिमी
दरिया नज़र न आए न सहरा दिखाई दे
अख़तर मुस्लिमी
आँसुओं के तूफ़ाँ में बिजलियाँ दबी रखना
अख़तर मुस्लिमी
रौनक़ ही नहीं उस की हम रूह-ओ-रवाँ भी हैं
अख्तर लख़नवी
होश्यार कर रहा है गजर जागते रहो
अख्तर लख़नवी
दिल में टीसें जाग उठती हैं पहलू बदलते वक़्त बहुत
अख्तर लख़नवी
दिल के हर ज़ख़्म को पलकों पे सजाया तो गया
अख्तर लख़नवी
देखो उस ने क़दम क़दम पर साथ दिया बेगाने का
अख्तर लख़नवी
अब दर्द का सूरज कभी ढलता ही नहीं है
अख्तर लख़नवी
जो संग हो के मुलाएम है सादगी की तरह
अख़तर इमाम रिज़वी
जीते-जी दुख सुख के लम्हे आते जाते रहते हैं
अख़तर इमाम रिज़वी
हर बुत यहाँ टूटे हुए पत्थर की तरह है
अख़तर इमाम रिज़वी
दुनिया भी पेश आई बहुत बे-रुख़ी के साथ
अख़तर इमाम रिज़वी
दिल वो प्यासा है कि दरिया का तमाशा देखे
अख़तर इमाम रिज़वी
चाँदनी के हाथ भी जब हो गए शल रात को
अख़तर इमाम रिज़वी
अश्क जब दीदा-ए-तर से निकला
अख़तर इमाम रिज़वी
विसाल
अख़्तर हुसैन जाफ़री
सुख़न दरमाँदा है
अख़्तर हुसैन जाफ़री
स्कूल
अख़्तर हुसैन जाफ़री
सधाए हुए परिंदे
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
अख़्तर हुसैन जाफ़री
इम्तिनाअ का महीना
अख़्तर हुसैन जाफ़री
इक इनआ'म के कितने नाम हैं
अख़्तर हुसैन जाफ़री
इक हर्फ़-ए-फ़सुर्दा दाग़ में है
अख़्तर हुसैन जाफ़री