Love Poetry (page 321)
तपिश गुलज़ार तक पहुँची लहू दीवार तक आया
अख़्तर हुसैन जाफ़री
सब ख़याल उस के लिए हैं सब सवाल उस के लिए
अख़्तर हुसैन जाफ़री
हिज्र इक हुस्न है इस हुस्न में रहना अच्छा
अख़्तर हुसैन जाफ़री
गुज़रते वक़्त ने क्या क्या न चारा-साज़ी की
अख़्तर होशियारपुरी
'अख़्तर' गुज़रते लम्हों की आहट पे यूँ न चौंक
अख़्तर होशियारपुरी
यक-ब-यक मौसम की तब्दीली क़यामत ढा गई
अख़्तर होशियारपुरी
वो ज़िंदगी है उस को ख़फ़ा क्या करे कोई
अख़्तर होशियारपुरी
वो रतजगा था कि अफ़्सून-ए-ख़्वाब तारी था
अख़्तर होशियारपुरी
वो रंग-ए-तमन्ना है कि सद-रंग हुआ हूँ
अख़्तर होशियारपुरी
वो जो दीवार-ए-आश्नाई थी
अख़्तर होशियारपुरी
उफ़ुक़ उफ़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं
अख़्तर होशियारपुरी
तूफ़ान-ए-अब्र-ओ-बाद से हर-सू नमी भी है
अख़्तर होशियारपुरी
तूफ़ाँ से क़र्या क़र्या एक हुए
अख़्तर होशियारपुरी
तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ
अख़्तर होशियारपुरी
थी तितलियों के तआ'क़ुब में ज़िंदगी मेरी
अख़्तर होशियारपुरी
था एक साया सा पीछे पीछे जो मुड़ के देखा तो कुछ नहीं था
अख़्तर होशियारपुरी
शिकारी रात भर बैठे रहे ऊँची मचानों पर
अख़्तर होशियारपुरी
शायान-ए-ज़िंदगी न थे हम मो'तबर न थे
अख़्तर होशियारपुरी
शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते
अख़्तर होशियारपुरी
शाख़ों पे ज़ख़्म हैं कि शगूफ़े खिले हुए
अख़्तर होशियारपुरी
रुख़्सत-ए-रक़्स भी है पाँव में ज़ंजीर भी है
अख़्तर होशियारपुरी
क़र्या-ए-जाँ से गुज़र कर हम ने ये देखा भी है
अख़्तर होशियारपुरी
पहले तो सोच के दोज़ख़ में जलाता है मुझे
अख़्तर होशियारपुरी
मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ
अख़्तर होशियारपुरी
मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ
अख़्तर होशियारपुरी
मंज़िलों के फ़ासले दीवार-ओ-दर में रह गए
अख़्तर होशियारपुरी
मैं ने यूँ देखा उसे जैसे कभी देखा न था
अख़्तर होशियारपुरी
मैं उस का नाम घुले पानियों पे लिखता क्या
अख़्तर होशियारपुरी
मैं हर्फ़ देखूँ कि रौशनी का निसाब देखूँ
अख़्तर होशियारपुरी
क्या पूछते हो मुझ से कि मैं किस नगर का था
अख़्तर होशियारपुरी