Love Poetry (page 333)

सहरा-ए-ला-हुदूद में तिश्ना-लबी की ख़ैर

अजय सहाब

मेरे अंदर जो इक फ़क़ीरी है

अजय सहाब

लगा के धड़कन में आग मेरी ब-रंग-ए-रक़्स-ए-शरर गया वो

अजय सहाब

बिखरा हूँ जब मैं ख़ुद यहाँ कोई मुझे गिराए क्यूँ

अजय सहाब

ये बरसों का तअल्लुक़ तोड़ देना चाहते हैं हम

ऐतबार साजिद

तअल्लुक़ किर्चियों की शक्ल में बिखरा तो है फिर भी

ऐतबार साजिद

मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती

ऐतबार साजिद

जिस को हम ने चाहा था वो कहीं नहीं इस मंज़र में

ऐतबार साजिद

अजब नशा है तिरे क़ुर्ब में कि जी चाहे

ऐतबार साजिद

ज़ख़्मों का दो-शाला पहना धूप को सर पर तान लिया

ऐतबार साजिद

ये क्या हालत बना रक्खी है ये आसार कैसे हैं

ऐतबार साजिद

ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे न जा

ऐतबार साजिद

ये बरसों का तअल्लुक़ तोड़ देना चाहते हैं हम

ऐतबार साजिद

वो पहली जैसी वहशतें वो हाल ही नहीं रहा

ऐतबार साजिद

तुम्हें ख़याल-ए-ज़ात है शुऊर-ए-ज़ात ही नहीं

ऐतबार साजिद

तिलिस्म-ज़ार-ए-शब-ए-माह में गुज़र जाए

ऐतबार साजिद

तिरे जैसा मेरा भी हाल था न सुकून था न क़रार था

ऐतबार साजिद

तर्क-ए-तअल्लुक़ कर तो चुके हैं इक इम्कान अभी बाक़ी है

ऐतबार साजिद

शहर-ए-हवा में जलते रहना अंदेशों की चौखट पर

ऐतबार साजिद

फूलों में वो ख़ुशबू वो सबाहत नहीं आई

ऐतबार साजिद

फिर वही लम्बी दो-पहरें हैं फिर वही दिल की हालत है

ऐतबार साजिद

न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का

ऐतबार साजिद

मुहताज हम-सफ़र की मसाफ़त न थी मिरी

ऐतबार साजिद

मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है

ऐतबार साजिद

किसी ने दिल के ताक़ पर जला के रख दिया हमें

ऐतबार साजिद

किसी को हम से हैं चंद शिकवे किसी को बेहद शिकायतें हैं

ऐतबार साजिद

कैसे कहीं कि जान से प्यारा नहीं रहा

ऐतबार साजिद

कहा तख़्लीक़-ए-फ़न बोले बहुत दुश्वार तो होगी

ऐतबार साजिद

कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है

ऐतबार साजिद

जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

ऐतबार साजिद