Love Poetry (page 331)

मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है

अजमल सिराज

किसी की क़ैद से आज़ाद हो के रह गए हैं

अजमल सिराज

किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है

अजमल सिराज

जो कल हैरान थे उन को परेशाँ कर के छोड़ूँगा

अजमल सिराज

जो अश्क बरसा रहे हैं साहिब

अजमल सिराज

हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे

अजमल सिराज

गुज़र गई है अभी साअत-ए-गुज़िश्ता भी

अजमल सिराज

घूम-फिर कर इसी कूचे की तरफ़ आएँगे

अजमल सिराज

दीवार याद आ गई दर याद आ गया

अजमल सिराज

और तो ख़ैर क्या रह गया

अजमल सिराज

हर एक सुब्ह वज़ू करती हैं मिरी आँखें

अजमल सिद्दीक़ी

अलग अलग तासीरें इन की, अश्कों के जो धारे हैं

अजमल सिद्दीक़ी

ज़िंदगी रोज़ बनाती है बहाने क्या क्या

अजमल सिद्दीक़ी

रो रो के बयाँ करते फिरो रंज-ओ-अलम ख़ूब

अजमल सिद्दीक़ी

न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका

अजमल सिद्दीक़ी

इतराता गरेबाँ पर था बहुत, रह-ए-इश्क़ में कब का चाक हुआ

अजमल सिद्दीक़ी

इतना करम इतनी अता फिर हो न हो

अजमल सिद्दीक़ी

दुखे दिलों पे जो पड़ जाए वो तबीब नज़र

अजमल सिद्दीक़ी

अलग अलग तासीरें इन की, अश्कों के जो धारे हैं

अजमल सिद्दीक़ी

तार-ए-नज़र भी ग़म की तमाज़त से ख़ुश्क है

अजमल अजमली

माँ ने लिखा है ख़त में जहाँ जाओ ख़ुश रहो

अजमल अजमली

कितनी तवील क्यूँ न हो बातिल की ज़िंदगी

अजमल अजमली

हज़ार मंज़िल-ए-ग़म से गुज़र चुके लेकिन

अजमल अजमली

आरज़ू थी खींचते हम भी कोई अक्स-ए-हयात

अजमल अजमली

वक़्त-ए-सफ़र क़रीब है बिस्तर समेट लूँ

अजमल अजमली

तिरी नज़र भी नहीं हर्फ़-ए-मुद्दआ भी नहीं

अजमल अजमली

शहर शहर ढूँड आए दर-ब-दर पुकार आए

अजमल अजमली

रास्ते के पेच-ओ-ख़म क्या शय हैं सोचा ही नहीं

अजमल अजमली

हर उजाला नई सहर तो नहीं

अजमल अजमली

हर घड़ी रहता है अब ख़दशा मुझे

अजमल अजमली