Love Poetry (page 330)
दश्त-ए-ग़ुर्बत है अलालत भी है तन्हाई भी
अकबर इलाहाबादी
दर्द तो मौजूद है दिल में दवा हो या न हो
अकबर इलाहाबादी
चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं
अकबर इलाहाबादी
बे-तकल्लुफ़ बोसा-ए-ज़ुल्फ़-ए-चलीपा लीजिए
अकबर इलाहाबादी
बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
अकबर इलाहाबादी
अपने पहलू से वो ग़ैरों को उठा ही न सके
अकबर इलाहाबादी
आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
अकबर इलाहाबादी
आज आराइ-ए-शगेसू-ए-दोता होती है
अकबर इलाहाबादी
ये तन घिरा हुआ छोटे से घर में रहता है
अकबर अली खान अर्शी जादह
ये शौक़ सारे यक़ीन-ओ-गुमाँ से पहले था
अकबर अली खान अर्शी जादह
वही गुमाँ है जो उस मेहरबाँ से पहले था
अकबर अली खान अर्शी जादह
तेरा ख़याल जाँ के बराबर लगा मुझे
अकबर अली खान अर्शी जादह
सिखा सकी न जो आदाब-ए-मय वो ख़ू क्या थी
अकबर अली खान अर्शी जादह
सज़ा है किस के लिए और जज़ा है किस के लिए
अकबर अली खान अर्शी जादह
मिरे ख़्वाबों में ख़यालों में मिरे पास रहो
अकबर अली खान अर्शी जादह
किया है मैं ने तआ'क़ुब वो सुब्ह-ओ-शाम अपना
अकबर अली खान अर्शी जादह
ख़ुश-रंग किस क़दर ख़स-ओ-ख़ाशाक थे कभी
अकबर अली खान अर्शी जादह
कभी ज़ख़्म ज़ख़्म निखर के देख कभी दाग़ दाग़ सँवर के देख
अकबर अली खान अर्शी जादह
हुस्न ही के दम से हैं ये कहानियाँ सारी
अकबर अली खान अर्शी जादह
आज यूँ मुझ से मिला है कि ख़फ़ा हो जैसे
अकबर अली खान अर्शी जादह
ज़िंदगी हम से चाहती क्या है
अजमल सिराज
कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए
अजमल सिराज
अब आप ख़ुद ही बताएँ ये ज़िंदगी क्या है
अजमल सिराज
ज़मीं पर आसमाँ कब तक रहेगा
अजमल सिराज
वही बे-बाकी-ए-उश्शाक़ है दरकार अब भी
अजमल सिराज
तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँगा मैं
अजमल सिराज
सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की
अजमल सिराज
शाम अपनी बे-मज़ा जाती है रोज़
अजमल सिराज
पेश जो आया सर-ए-साहिल शब बतलाया
अजमल सिराज
नज़र आ रहे हैं जो तन्हा से हम
अजमल सिराज