Love Poetry (page 335)
मुझी में जीता है सूरज तमाम होने तक
ऐनुद्दीन आज़िम
मेरे हमराह सितारे कभी जुगनू निकले
ऐनुद्दीन आज़िम
मैं ने जब हद से गुज़रने का इरादा कर लिया
ऐनुद्दीन आज़िम
ला-मकाँ से भी परे ख़ुद से मुलाक़ात करें
ऐनुद्दीन आज़िम
कारोबारी शहरों में ज़ेहन-ओ-दिल मशीनें हैं जिस्म कारख़ाना है
ऐनुद्दीन आज़िम
दर्द तेरा मिरे सीने से निकाला न गया
ऐनुद्दीन आज़िम
अब जुनूँ के रत-जगे ख़िरद में आ गए
ऐनुद्दीन आज़िम
जी लगा रक्खा है यूँ ताबीर के औहाम से
ऐन ताबिश
एक ख़ुश्बू थी जो मल्बूस पे ताबिंदा थी
ऐन ताबिश
एक बस्ती थी हुई वक़्त के अंदोह में गुम
ऐन ताबिश
ज़मीन अपने बेटों को पहचानती है
ऐन ताबिश
पुरानी फ़ाइलों में गुनगुनाती शाम
ऐन ताबिश
मुलाक़ातें नहीं फिर भी मुलाक़ातें
ऐन ताबिश
मैं अल्बम के वरक़ जब भी उलटता हूँ
ऐन ताबिश
हवेली मौत की दहलीज़ पर
ऐन ताबिश
इक शहर था इक बाग़ था
ऐन ताबिश
बदलने का कोई मौसम नहीं होता
ऐन ताबिश
अदम से परे
ऐन ताबिश
यहाँ के रंग बड़े दिल-पज़ीर हुए हैं
ऐन ताबिश
वही जुनूँ की सोख़्ता-जानी वही फ़ुसूँ अफ़्सानों का
ऐन ताबिश
ताबिश ये भला कौन सी रुत आई है जानी
ऐन ताबिश
प्यास बढ़ती हुई ता-हद्द-ए-नज़र पानी था
ऐन ताबिश
मेरी तन्हाई के एजाज़ में शामिल है वही
ऐन ताबिश
ख़ाकसारी थी कि बिन देखे ही हम ख़ाक हुए
ऐन ताबिश
कैसे अफ़्सूँ थे वहाँ कैसे फ़साने थे उधर
ऐन ताबिश
जी रहे हैं आफ़ियत में तो हुनर ख़्वाबों का है
ऐन ताबिश
हयात-ए-सोख़्ता-सामाँ इक इस्तिअा'रा-ए-शाम
ऐन ताबिश
गुज़रते वक़्त को बुनियाद करने वाला हूँ
ऐन ताबिश
न तीरगी के लिए हूँ न रौशनी के लिए
ऐन सलाम
शहर
ऐन रशीद