Love Poetry (page 35)
ये बातें झूटी बातें हैं
इब्न-ए-इंशा
सब माया है
इब्न-ए-इंशा
पिछले-पहर के सन्नाटे में
इब्न-ए-इंशा
फिर शाम हुई
इब्न-ए-इंशा
क्या धोका देने आओगी
इब्न-ए-इंशा
कुछ दे इसे रुख़्सत कर
इब्न-ए-इंशा
कातिक का चाँद
इब्न-ए-इंशा
कल हम ने सपना देखा है
इब्न-ए-इंशा
इस बस्ती के इक कूचे में
इब्न-ए-इंशा
फ़र्ज़ करो
इब्न-ए-इंशा
एक बार कहो तुम मेरी हो
इब्न-ए-इंशा
दिल-आशोब
इब्न-ए-इंशा
दिल इक कुटिया दश्त किनारे
इब्न-ए-इंशा
दरवाज़ा खुला रखना
इब्न-ए-इंशा
चाँद के तमन्नाई
इब्न-ए-इंशा
ऐ मिरे सोच-नगर की रानी
इब्न-ए-इंशा
ऐ मतवालो! नाक़ों वालो!!
इब्न-ए-इंशा
शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती
इब्न-ए-इंशा
सब को दिल के दाग़ दिखाए एक तुझी को दिखा न सके
इब्न-ए-इंशा
राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा
इब्न-ए-इंशा
रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे
इब्न-ए-इंशा
पीत करना तो हम से निभाना सजन हम ने पहले ही दिन था कहा ना सजन
इब्न-ए-इंशा
लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुए
इब्न-ए-इंशा
कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो
इब्न-ए-इंशा
किस को पार उतारा तुम ने किस को पार उतारोगे
इब्न-ए-इंशा
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
इब्न-ए-इंशा
जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो
इब्न-ए-इंशा
जल्वा-नुमाई बे-परवाई हाँ यही रीत जहाँ की है
इब्न-ए-इंशा
जब दहर के ग़म से अमाँ न मिली हम लोगों ने इश्क़ ईजाद किया
इब्न-ए-इंशा
जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में
इब्न-ए-इंशा