Love Poetry (page 36)
इस शहर के लोगों पे ख़त्म सही ख़ु-तलअ'ती-ओ-गुल-पैरहनी
इब्न-ए-इंशा
'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
इब्न-ए-इंशा
'इंशा'-जी है नाम उन्ही का चाहो तो तुम से मिलवाएँ
इब्न-ए-इंशा
हम उन से अगर मिल बैठे हैं क्या दोश हमारा होता है
इब्न-ए-इंशा
हम जंगल के जोगी हम को एक जगह आराम कहाँ
इब्न-ए-इंशा
हमें तुम पे गुमान-ए-वहशत था हम लोगों को रुस्वा किया तुम ने
इब्न-ए-इंशा
दिल किस के तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है
इब्न-ए-इंशा
दिल इश्क़ में बे-पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो
इब्न-ए-इंशा
दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो
इब्न-ए-इंशा
देख हमारी दीद के कारन कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ
इब्न-ए-इंशा
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ
इब्न-ए-इंशा
अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हज़ार करें
इब्न-ए-इंशा
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले
इब्न-ए-इंशा
क्या ख़बर थी इंक़लाब आसमाँ हो जाएगा
हुसैन मीर काश्मीरी
उस का चेहरा उदास है 'माजिद'
हुसैन माजिद
तूफ़ाँ कोई नज़र में न दरिया उबाल पर
हुसैन माजिद
शाम छत पर उतर गई होगी
हुसैन माजिद
लोगों ने आकाश से ऊँचा जा कर तमग़े पाए
हुसैन माजिद
धूल-भरी आँधी में सब को चेहरा रौशन रखना है
हुसैन माजिद
उलझनें इतनी थीं मंज़र और पस-मंज़र के बीच
हुसैन ताज रिज़वी
सुबूत-ए-जुर्म न मिलने का फिर बहाना किया
हुसैन ताज रिज़वी
माहौल से जैसे कि घुटन होने लगी है
हुसैन ताज रिज़वी
जब झूट रावियों के क़लम बोलने लगे
हुसैन ताज रिज़वी
इस हाल में जीते हो तो मर क्यूँ नहीं जाते
हुसैन ताज रिज़वी
है मेरे गिर्द यक़ीनन कहीं हिसार सा कुछ
हुसैन ताज रिज़वी
ढली जो शाम नज़र से उतर गया सूरज
हुसैन ताज रिज़वी
किरन किरन के दरख़्शंदा बाब मेरे हैं
हुसैन सहर
इतनी सी इस जहाँ की हक़ीक़त है और बस
हुसैन सहर
मर-मिटे जब से हम उस दुश्मन-ए-दीं पर साहब
हुसैन मजरूह
रौशनी में खोई गई रौशनी
हुसैन आबिद