Love Poetry (page 34)
ज़ेहन से दिल का बार उतरा है
इब्न-ए-सफ़ी
यूँही वाबस्तगी नहीं होती
इब्न-ए-सफ़ी
राह-ए-तलब में कौन किसी का अपने भी बेगाने हैं
इब्न-ए-सफ़ी
लब-ओ-रुख़्सार ओ जबीं से मिलिए
इब्न-ए-सफ़ी
कुछ तो तअल्लुक़ कुछ तो लगाओ
इब्न-ए-सफ़ी
छलकती आए कि अपनी तलब से भी कम आए
इब्न-ए-सफ़ी
बड़े ग़ज़ब का है यारो बड़े अज़ाब का ज़ख़्म
इब्न-ए-सफ़ी
आज की रात कटेगी क्यूँ कर साज़ न जाम न तो मेहमान
इब्न-ए-सफ़ी
क्या क्या हैं गिले उस को बता क्यूँ नहीं देता
इब्न-ए-रज़ा
यूँ तो पत्थर बहुत से देखे हैं
इब्न-ए-मुफ़्ती
ये कारोबार भी कब रास आया
इब्न-ए-मुफ़्ती
कैसा जादू है समझ आता नहीं
इब्न-ए-मुफ़्ती
अजब है खेल कैरम का
इब्न-ए-मुफ़्ती
वो ख़्वाब जैसा था गोया सराब लगता था
इब्न-ए-मुफ़्ती
शौक़ जब भी बंदगी का रहनुमा होता नहीं
इब्न-ए-मुफ़्ती
फिर से वो लौट कर नहीं आया
इब्न-ए-मुफ़्ती
कर बुरा तो भला नहीं होता
इब्न-ए-मुफ़्ती
हम से मिलते थे सितारे आप के
इब्न-ए-मुफ़्ती
ग़लत-फ़हमी की सरहद पार कर के
इब्न-ए-मुफ़्ती
दिल वही अश्क-बार रहता है
इब्न-ए-मुफ़्ती
बर्क़ ने जब भी आँख खोली है
इब्न-ए-मुफ़्ती
वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं
इब्न-ए-इंशा
वहशत-ए-दिल के ख़रीदार भी नापैद हुए
इब्न-ए-इंशा
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
इब्न-ए-इंशा
हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता
इब्न-ए-इंशा
गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं
इब्न-ए-इंशा
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले
इब्न-ए-इंशा
ये सराए है
इब्न-ए-इंशा
ये कौन आया
इब्न-ए-इंशा
ये बच्चा किस का बच्चा है
इब्न-ए-इंशा